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Mar 8, 2019

March 08, 2019

Sex in Pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स

गर्भावस्था में सेक्स (Sex in pregnancy in hindi) एक बहुत ही संवेदनशील और ज़रूरी विषय है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से कभी उनमें सेक्स करने की (रिलेशन बनाने की) इच्छा होती है, तो कभी नहीं। गर्भावस्था में सेक्स करना सही है या नहीं, या फिर इससे शिशु को नुकसान होता है, ये सारे सवाल हर गर्भवती महिला के मन में होते हैं।

गर्भवती महिलाओं के इन्ही तमाम सवालों का समाधान हम इस ब्लॉग के जरिये बताने जा रहे हैं, ताकि गर्भावस्था में सेक्स को लेकर महिलाएं तनाव मुक्त रहें।






    Sex in pregnancy in hindi

    क्या गर्भावस्था में सेक्स करना सुरक्षित है? (Kya pregnancy me sex karna surakshit hai)


    Sex in pregnancy in hindi

    गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) करने को लेकर गर्भवती महिलाओं के मन में कई तरह के सवाल होते हैं, जिनमें पहला सवाल तो यही होता है कि क्या गर्भावस्था में सेक्स करना सुरक्षित है?

    विशेषज्ञों के अनुसार, अगर गर्भवती को गर्भावस्था से संबंधित कोई जटिलता या स्वास्थ्य संबंधी कोई अन्य समस्या नहीं है, तो इस दौरान सेक्स करना बिल्कुल सुरक्षित है। कई लोग गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में चिंतित रहते हैं कि कहीं सेक्स से उसे कोई नुकसान ना हो जाए। मगर, शिशु गर्भाशय के अंदर सुरक्षित होता है, इसलिए थोड़ी सावधानियों के साथ आप आराम से सेक्स कर सकते हैं।

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    यूँ तो गर्भावस्था में रिलेशन बनाना (pregnancy me sambhog) सुरक्षित होता है, और आप जितना चाहें उतना सेक्स कर सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में सावधानी बरतने में ही आपकी भलाई होती है।

    किन स्थितियों में गर्भावस्था में सेक्स नहीं करना चाहिए? (Pregnancy me sex kab nahi karna chahiye)


    विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ विशेष स्थितियों में आपको प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) करने से बचना चाहिए। इनमें से कुछ प्रमुख स्थितियों के बारे में नीचे बताया गया है -

    • अगर आपका पहले कभी गर्भपात हुआ हो, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) नहीं चाहिए। इसके साथ ही अगर वर्तमान गर्भावस्था में आपको गर्भपात होने का ख़तरा है, तो आपको इस दौरान सावधानी के तौर पर सेक्स से दूरी बना कर रखनी चाहिए।
    • अगर आपकी पिछली गर्भावस्था में आपका समयपूर्व प्रसव (premature delivery in hindi) हो गया था, तो आपको डॉक्टर की सलाह से ही प्रेगनेंसी में सेक्स करना चाहिए।
    • अगर आपको प्लेसेंटा से जुड़ी कोई समस्या (जैसे प्लेसेंटा प्रिविआ) है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) नहीं करना चाहिए।
    • अगर आपकी गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स सामान्य नहीं है या समय से पहले खुलने लगी है, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sex) से बचना चाहिए।
    • अगर आपके गर्भाशय की झिल्ली में छेद है और आपका एमनियोटिक द्रव लीक होता है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं करना चाहिए।
    • अगर आपकी योनि से बिना किसी वजह से रक्तस्राव हो रहा है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं (pregnancy me sex) करना चाहिए।
    • अगर आपके पति को यौन संक्रामक रोग जैसे जेनिटल हर्पीज (जननांग में दाद-खुजली), एच.आई.वी./एड्स, गोनोरिया आदि है, तो आपको हर हालत में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) से बचना चाहिए। अगर आपका सेक्स करने का बहुत ज्यादा मन है, तो आपको डॉक्टर की सलाह से, अच्छी गुणवत्ता का कंडोम लगाकर ही सेक्स करना चाहिए।
    • अगर आपको सेक्स के बाद गर्भाशय संकुचन महसूस होते हैं, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं करना चाहिए।

    गर्भावस्था की पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में सेक्स कैसे करें? (Pregnancy ki pehli, dusri aur tisri timahi me sex kaise kare)


    एक शोध के अनुसार, गर्भावस्था की तीनों तिमाहियों में सेक्स किया जा सकता है। हालांकि यह आपकी आम सेक्सुअल लाइफ से थोड़ा अलग होता है, लेकिन कुछ सावधानियों के साथ आप प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) का भरपूर मजा ले सकते हैं। आपको गर्भावस्था की विभिन्न तिमाहियों में निम्न तरह से सेक्स करना चाहिए -

    • पहली तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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    आमतौर पर गर्भावस्था की शुरूआत में संभोग करना सुरक्षित होता है, लेकिन सावधानी के तौर पर आपको शुरुआती दो - तीन हफ़्तों के लिए सेक्स नहीं करना चाहिए। पहली तिमाही में सेक्स करना दूसरी व तीसरी तिमाही की तुलना में आसान होता है, क्योंकि अभी आपका पेट ज्यादा बढ़ता नहीं है। प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के दौरान ऐसी अवस्था में रहें, जिससे आपके पेट पर दबाव ना पड़े और गर्भ सुरक्षित रहे।

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    • दूसरी तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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    गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में आपके शरीर में कई बदलाव होते हैं। इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव की वजह से आपकी सेक्स करने की इच्छा कभी बहुत ज्यादा तो कभी बिल्कुल कम हो सकती है। इस दौरान आराम से सेक्स करें और अपने पेट पर बिल्कुल दबाव ना पड़ने दें। अगर आप शारीरिक रूप से फिट हैं और आपको डॉक्टर ने सेक्स करने के लिए मना नहीं किया है, तो आप प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) कर सकते हैं।

    • तीसरी तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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    गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में सेक्स करने से पहले ज्यादातर लोगों के मन में एक चिंता रहती है, कि इससे समयपूर्व प्रसव तो नहीं हो जाएगा। विशेषज्ञ बताते हैं, कि कुछ दुर्लभ मामलों को छोड़कर प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) की वजह से समयपूर्व प्रसव नहीं होता है। इस दौरान कुछ सुरक्षित स्थितियों में ही सेक्स करना चाहिए (जैसे - करवट वाली स्थिति, महिला का ऊपर होना आदि) ताकि आपके पेट पर दबाव ना पड़े।

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    नोट -अगर आपके मन में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) को लेकर कोई सवाल या चिंता है, तो डॉक्टर से बेहिचक बात करें, क्योंकि वो आपको आपकी स्थिति के अनुसार सही सलाह दे पाएंगे।

    क्या प्रेगनेंसी में सेक्स करने से शिशु को नुकसान पहुंचता है? (Kya pregnancy me sex karne se shishu ko nuksan pahuchta hai)


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    नहीं, गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आपके शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। शिशु के चारों तरफ एमनियोटिक द्रव और गर्भाशय की मांसपेशियों का मजबूत कवच होता है। इस कवच की वजह से सेक्स के दौरान शरीर में होने वाली हलचल का शिशु पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

    इसके साथ ही आपके पति का लिंग आमतौर पर आपकी सर्विक्स तक नहीं पहुंच सकता है, इसलिए सेक्स के दौरान केवल योनि ही प्रभावित होती है।

    क्या प्रेगनेंसी में सेक्स करने से प्रसवपीड़ा शुरू हो सकती है? (Kya pregnancy me sex karne se labor pain shuru ho sakta hai)


    अगर आपकी गर्भावस्था सामान्य और जोखिम-रहित है, तो इस दौरान सेक्स करने या ऑर्गेजम यानी चरमोत्कर्ष पर पहुंचने से प्रसवपीड़ा शुरू होने का खतरा न के बराबर होता है। मगर, ऑर्गेजम के साथ ही पति के वीर्य में मौजूद प्रोस्टेगलैंडिन हॉर्मोन (prostaglandins in hindi) की वजह से आपको गर्भाशय में हल्के संकुचन महसूस हो सकते हैं।

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    गर्भावस्था में सेक्स करने की सही अवस्थाएं क्या हैं? (Pregnancy me sex karne ki sahi positions kya hai)

    Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स

    गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) करते समय आपको वही स्थिति अपनानी चाहिए, जिससे पेट के निचले हिस्से पर दबाव कम पड़े। तो चलिए जानते हैं कि आप गर्भावस्था के दौरान किन स्थितियों में सेक्स कर सकते हैं।

    • करवट वाली स्थिति - इस तरह की स्थिति में महिला के पेट के निचले हिस्से में कम दबाव पड़ता है। गर्भावस्था में सेक्स करवट वाली स्थिति में करना सुरक्षित माना जाता है।
    • महिला का ऊपर होना - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) के दौरान महिला को ऊपर होने वाली स्थिति अपनानी चाहिए। महिला जब ऊपर होती है, तो उसके पेट पर दबाव नहीं पड़ता है। साथ ही वो समय समय पर खुद को नियंत्रित करने में भी सक्षम रहती है।
    • लेटने वाली स्थिति - इस स्थिति में महिला पेट को ऊपर करके पीठ के बल लेटती है और उसके घुटने ऊपर की तरफ होते हैं, तो तलवे जमीन से जुड़े रहते हैं। गर्भावस्था में संभोग इस स्थिति में करने से महिला को कोई असुविधा नहीं होती।

    क्या गर्भावस्था में मौखिक सेक्स कर सकते हैं? (Kya pregnancy me oral sex karna safe hai)

    Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स


    गर्भावस्था में योनि सेक्स से बेहतर मौखिक सेक्स होता है, लेकिन मौखिक सेक्स में कुछ चीजों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। दरअसल, मौखिक सेक्स (oral sex in hindi) करते समय आपको योनि में फूंक नहीं मारनी चाहिए, इससे वायु के बुलबुले रक्त वाहिका में रूकावट डालते हैं, जिसकी वजह से महिला या शिशु की मौत हो सकती है।

    अगर आपको या आपके पति को किसी भी तरह का संक्रमण हो तो मौखिक सेक्स नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण बढ़ता है। अगर आपको ओरल सेक्स (oral sex in hindi) करने में कोई भी दुविधा हो तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    गर्भावस्था में सेक्स करने के क्या फायदे हैं? (Pregnancy me sex karne ke fayde kya hai)

    Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स

    गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करना मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी है। तो चलिए जानते हैं कि प्रेगनेंसी में सेक्स करने के क्या फायदे हो सकते हैं।

    • ब्लड प्रेशर कम करता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से ब्लड प्रेशर (bp) कम होता है। ज्यादा ब्लड प्रेशर मां और शिशु दोनों के लिए हानिकारक है।
    • वजन कम करने में सहायक होता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आप ज्यादा फिट रह सकती हैं। इस दौरान आप सिर्फ 30 मिनट में 50 कैलोरी से ज्यादा खो सकती हैं, जोकि हेल्थ के लिए अच्छा है।
    • दर्द सहने की क्षमता को बढ़ाता है - गर्भावस्था में सेक्स करने से आपकी सहनशक्ति 78 प्रतिशत बढ़ जाती है, जिससे प्रसव के समय आपको थोड़ा आराम महसूस हो सकता है।
    • प्रसव के बाद जल्दी ठीक होने में मददगार होता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आप प्रसव के बाद जल्दी ठीक हो सकती हैं, क्योंकि प्रेगनेंसी में सेक्स आपकी योनि से शिशु के जन्म को सरल बना देती है। जब शिशु का जन्म थोड़ा सरल होता है, तब प्रसव के बाद जल्दी ठीक होने की संभावना होती हैं।

    प्रेगनेंसी में सेक्स के बाद किन स्थितियों में डॉक्टर से सम्पर्क करें? (Pregnancy me sex ke baad kin sthitiyo me doctor se salah le)


    गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के बाद निम्न स्थितियों में डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए -

    • गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) के दौरान व चरमोत्कर्ष पर पहुंचने पर आपको गर्भाशय में संकुचन महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर ये संकुचन दो से पांच मिनट बाद भी बंद नहीं हो रहे हैं।
    • अगर प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के बाद आपको पेट में दर्द या ऐंठन महसूस हो रही है।
    • अगर गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) के बाद आपको योनि से रक्तस्राव हो रहा है।

    क्या गर्भावस्था में सेक्स करने के बाद अलग महसूस होता है? (Kya Pregnancy me sex karne se alag mehsus hota hai)

    Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स


    गर्भावस्था में सेक्स करने से महिलाओं को कुछ अलग परिवर्तन महसूस होता है, जिसमें से कुछ परिवर्तन निम्नलिखित हैं।

    • गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) के बाद पेट में ऐंठन महसूस हो सकती है।
    • गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) के बाद निपल्स में दर्द महसूस हो सकता है।
    • गर्भावस्था में संभोग (pregnancy me relation banana) के बाद योनि से रक्तस्त्राव हो सकता है।
    • गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) से महिला ज्यादा सुख अनुभव कर सकती हैं।

    गर्भावस्था में सेक्स से जुड़े मिथक क्या है? (Pregnancy me sex se jude mithak kya hai)

    Sex in pregnancy in hindi


    गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) करने को लेकर कई सारे मिथक हैं। हम आपको कुछ चुनिंदा मिथक नीचे बता रहे हैं -

    • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : संभोग से गर्भपात हो सकता है - कई लोगों का मानना होता है कि गर्भावस्था में सेक्स करने से गर्भपात हो सकता है। गर्भावस्था में सेक्स गर्भपात का कारण नहीं बनता है, क्योंंकि सेक्स का संकुचन और प्रसव का संकुचन अलग होता है। गौरतलब है कि आपको डॉक्टर से संपर्क करके यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आप पूरी तरह से फिट हैं।
    • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : शिशु को पता चल जाता है - कुछ लोग यह मानते हैं कि गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने के दौरान शिशु को सब पता चल जाता है कि उसके माता पिता क्या कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चा गर्भ थैली और गर्भाशय की मांसपेशियों से पूरी तरह से ढका रहता है।
    • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : शिशु को चोट लगती है - गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me relation banana) को लेकर एक मिथक यह है कि अगर इस दौरान सेक्स करते हैं, तो शिशु को चोट लग जाती है, जबकि सच्चाई यह है कि शिशु पूरी तरह से गर्भ की थैली में सुरक्षित होता है, ऐसे में उसे चोट नहीं लग सकती है।
    गर्भावस्था के दौरान आप अपने पति को पहले से भी ज्यादा आकर्षित लग सकती हैं। ऐसे में आपके पति आपको संबंध बनाने के लिए कहें, और आपका भी मन हो तो आपको बेहिचक प्रेगनेंसी में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) करना चाहिए। इस दौरान पेट पर दबाव ना पड़ने दें, ताकि शिशु को किसी प्रकार की परेशानी ना हो।

    गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy in hindi) करना सुरक्षित है, लेकिन अगर आपको डॉक्टर ने सेक्स करने के लिए मना किया है, तो आप सेक्स ना करें। इसके साथ ही अगर आपके मन में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) को लेकर किसी प्रकार की कोई दुविधा या चिंता है, तो आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

    Mar 6, 2019

    March 06, 2019

    Thyroid Problem in Pregnancy in Hindi: डिलीवरी के बाद थायराइड

    थायराइड क्या होता है? (thyroid kya hota hai) एक प्रकार की तितली के आकार की अंत स्रावी ग्रंथि (endocrine gland in Hindi) है, जो गले में होती है। यह दो इंच तक लंबी होती है और इसका भार तकरीबन आधे किलो तक होता है। थायराइड में दो प्रकार के हार्मोन यानी T3 और T4 हार्मोन होते है, जो मानव शरीर में सांस संबंधी समस्या और पाचन क्रिया में सहायक होते है। थायराइड ग्रंथि (thyroid gland in Hindi) हार्मोन बनाने, उन्हें सुरक्षित रखने और नसों में छोड़ने में अहम योगदान देती है। (Thyroid Problem in Pregnancy) इसके अलावा थायराइड हार्मोन शरीर के विभिन्न अंगों को सुचारू रूप से काम करने और शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करते है।





      Thyroid Problem in Pregnancy in Hindi

      डिलीवरी के बाद थायराइड की समस्या के क्या कारण होते है?

      • यूं तो डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने के सही कारण का पता अब तक नहीं चल पाया है, लेकिन जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान या उससे पहले थायराइड की समस्या होती है, अक्सर उनमें प्रसव के बाद थायराइड की समस्या बनी रहती है।
      • प्रेगनेंसी की शुरुआत में और डिलीवरी के समय कुछ महिलाओं के शरीर में एंटी थायराइड एंटीबॉडी (anti thyroid antibody in hindi) की मात्रा बढ़ने लगती है, जिसे प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने का एक कारण माना जाता है।
      • इसके अलावा जिन महिलाओं में प्रसव के बाद बीमारियों से लड़ने की क्षमता घटती-बढ़ती रहती है, उनमें पहले से स्व-प्रतिरक्षित (autoimmune in hindi) थायराइड की समस्या होती है। इस परिस्थिति को हाशीमोटो रोग के समान माना जाता है। Thyroid Problem in Pregnancy
      • कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसी वायरस या बैक्टीरिया की वजह से होता है, वहीं कुछ डॉक्टर्स इसकी वजह रोगी के जीन्स को मानते हैं।
      • इसके अलावा प्रसव के बाद थायराइड की समस्या आयोडीन की कमी, शुगर (टाइप 1 डायबिटीज) और अवसाद की वजह से भी हो सकती है।

      प्रसव के बाद थायरायड की समस्या कब होती है? (delivery ke baad thyroid ki samasya kab hoti hai)

      आमतौर पर महिलाओं को प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या बच्चे के जन्म के करीब चार से 12 महीनों के बीच होती है। दरअसल प्रेगनेंसी के बाद लगभग चार महीनों तक महिलाओं के शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली उनके थायरइड ग्रंथि पर निरंतर हमला करती है, जिसकी वजह से थायराइड हार्मोन का रिसाव होता है और वह रक्त कणिकाओं में मिल जाता है। इसकी वजह से महिला के शरीर में थायराइड हार्मोन की मात्रा या तो बढ़ जाती है या फिर घट जाती है।

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      प्रसव के बाद थायराइड की समस्या के लक्षण क्या है? (delivery ke baad thyroid ke lakshan kya hai)

      आमतौर पर थायराइड दो प्रकार के होते हैं, हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड। शिशु के जन्म के बाद आपको इनमें से किसी भी एक थायराइड की समस्या हो सकती हैं। महिलाओं में डिलीवरी के बाद थायराइड होने के लक्षण दिखाई देने पर आपको अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। नीचे प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) के लक्षणों को हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड के अंतर्गत दो भागों में विभाजित किया गया है।

      डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड के लक्षण क्या है (delivery ke baad hyperthyroidism ke lakshan kya hai)

      • वजन घटना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism in hindi) होने का सबसे पहला लक्षण वज़न का घटना हो सकता है।
      • थकान होना : अक्सर आपको थकान हो तो यह प्रसव के बाद हाइपर थायराइड का लक्षण हो सकता है।
      • घबराहट होना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism in hindi) होने पर अचानक घबराहट हो सकती है।
      • तेज़ धूप बर्दाश्त न कर पाना : तेज़ धूप बर्दाश्त ना कर पाना भी प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism in hindi) का लक्षण हो सकता है।
      • ज्यादा पसीना आना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism in hindi) की समस्या होने पर ज्यादा पसीना आ सकता है।
      • दिल की धड़कन बढ़ना : दिन के किसी भी समय अगर अचानक आपकी दिल की धड़कनें बढ़ने लगती है और आपको यह समस्या लगातार होती है तो यह प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism in hindi)का लक्षण हो सकता है।

      डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड के लक्षण क्या है (delivery ke baad hypothyroidism ke lakshan kya hai)

      • वजन बढ़ना : अगर शिशु के जन्म के बाद आपका वजन असामान्य रूप से बढ़ रहा है तो यह डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
      • ठंड बर्दाश्त न कर पाना : प्रेगनेंसी के बाद ठंड बर्दाश्त न कर पाने को डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड का लक्षण माना जा सकता है।
      • मिजाज़ बदलना : बच्चे के जन्म के बाद अगर बिना वजह आपका मिजाज़ बदल रहा है तो यह डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
      • कब्ज होना : गर्भावस्था के बाद अगर आपको कब्ज की समस्या है, तो यह प्रसव के बाद हाइपो थायराइड का लक्षण हो सकता है। Thyroid Problem in Pregnancy
      • शुष्क त्वचा होना : त्वचा का शुष्क होना भी डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का संकेत हो सकता है। हालांकि शरीर में पानी की कमी होने से भी एेसा हो सकता है।
      • ज्यादा थकान होना : ज्यादा थकान होना भी डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का संकेत हो सकता है।
      • बाल झड़ना : प्रेगनेंसी के बाद अचानक ज्यादा बाल झड़ना प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
      (नोट : ऊपर बताए गए सभी लक्षण कई अन्य समस्याओं के संकेत भी हो सकते हैं, इसीलिए इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर की सलाह लेना आपके लिए सबसे बेहतर होगा)।

      डिलीवरी के बाद थायराइड होने का पता कैसे लगाया जाता है? (delivery ke baad thyroid hone ka pata kaise lagaya jata hai)

      महिलाओं में डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या काफी असामान्य होती है, लेकिन अगर आपको थायराइड के किसी भी लक्षण का अनुभव होता है तो आप इसका पता लगाने के लिए अपने डॉक्टर की सलाह ले सकती हैं। ज्यादातर मामलों में डॉक्टर खून की जांच करने की सलाह देते हैं। इस जांच को थायराइड प्रोफाइल टेस्ट (thyroid profile test in hindi) कहा जाता है, और लगभग सभी जांच केंद्रों में उपलब्ध होती है। यह जांच विभिन्न प्रकार के थायराइड हार्मोन्स यानी T3 और T4 हार्मोन के स्तरों का पता लगाने के लिए की जाती है। आमतौर पर डॉक्टर यह जांच महिलाओं को प्रसव के तीन से छह महीने के बाद करवाने की सलाह देते हैं। इसके अलावा खून की जांच में थायराइड हार्मोन को असंतुलित पाए जाने पर डॉक्टर आपको अल्ट्रासाउंड (ultrasound in hindi) के माध्यम से थायराइड की जांच करने की सलाह दे सकते हैं।

      डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड की जांच :

      प्रसव के बाद थायरायड (delivery ke baad thyroid) की जांच अल्ट्रासेंसिटिव टीएसएच (TSH in hindi) के स्तर का पता लगाकर की जाती है। जांच में अगर थायरॉक्सिन यानी T4 हार्मोन के स्तर में बढ़ोत्तरी और थायराइड स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन (TSH / Thyroid Stimulating Hormone in hindi) का स्तर, न्यूनतम स्तर से नीचे पाया जाता है तो आपको डिलीवरी के बाद हाइपर थायरायड (delivery ke baad hyperthyroidism) हो सकता है। यदि आपको पहले ग्रेव्ज बीमारी की समस्या रही हो तो खून में थायराइड स्टिम्यूलेटिंग इम्यूनोग्लोबिन की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

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      डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड की जांच :

      डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की जांच में यदि आपके थायरॉक्सिन यानी T4 हार्मोन्स स्तर न्यूनतम से कम और थायराइड स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन (TSH / Thyroid Stimulating Hormone in hindi) के स्तर में बढ़ोत्तरी पाई जाती है तो आपको डिलीवरी के बाद हाइपो थायरायड (delivery ke baad hypothyroidism) हो सकता है। इस स्थिति में आपकी पियुष ग्रंथि से अधिक टीएसएच का स्राव होता है।

      क्या प्रसव के बाद थायराइड का इलाज हो सकता है? (kya delivery ke baad thyroid ka ilaj ho sakta hai)

      हां, प्रसव के बाद थायराइड का इलाज संभव है। हालांकि डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने के करीब 12 से 18 महीनों के बाद प्रसवोत्तर हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड का स्तर सामान्य हो जाता है, लेकिन ऐसा न होने पर डॉक्टर थायराइड के स्तर की निगरानी करते हैं और रोग से पीड़ित महिलाओं को हर चार महीने में थायराइड प्रोफाइल टेस्ट (thyroid profile test in hindi) करने की सलाह देते हैं। डॉक्टर्स कहते हैं कि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) का इलाज दवाइयों से नहीं किया जाता और ज्यादातर मामलों में यह एक साल के अंदर अपने आप ठीक हो जाता है। वहीं अगर डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) की समस्या ज्यादा है तो डॉक्टर थायराइड की जांच के नतीजों के आधार पर उपचार करते हैं।

      क्या डिलीवरी के बाद थायराइड की समस्या से मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है? (delivery ke baad thyroid ki samasya se maa ke doodh par prabhav padta hai)

      डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) होने की स्थिति में पीड़ित महिला के स्तनों में दूध बनना कम हो जाता है, क्योंकि मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया में थायराइड हार्मोनों का अहम योगदान होता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जब मां के खून में थायराइड हार्मोन की मात्रा कम होती है तो इससे दूध नहीं बन पाता है, इसीलिए डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) होने की स्थिति में थायरॉक्सिन हार्मोन (thyroxine hormone in hindi) के स्तर को नियंत्रण में रखा जाता है। इसके साथ ही डॉक्टर बताते हैं कि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) होने की स्थिति में मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है और स्तनों में ज्यादा दूध बनने लगता है। हालांकि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) का स्तर अनियंत्रित होने पर डॉक्टर ऑपरेशन या रेडियोएक्टिव थेरेपी की सलाह दे सकते हैं।

      प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem

      क्या प्रसव के बाद थायराइड की गोलियां लेना स्तनपान और शिशु के लिए सुरक्षित है? (kya delivery ke baad thyroid ki goliyan lena stanpan aur shishu ke liye surakshit hai)

      विशेषज्ञ कहते हैं कि आमतौर पर प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) के लिए दी जाने वाली गोलियों का असर स्तनपान पर नहीं होता है। मां के खून में भी दवा की कुछ ही मात्रा पहुंचती है, लेकिन इससे शिशु की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इसीलिए डॉक्टर स्तनपान के दौरान हाइपो थायराइड की गोलियां लेना सुरक्षित मानते हैं। वहीं डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) की समस्या के लिए मां को आमतौर पर कोई दवाई नहीं दी जाती, क्योंकि कई मामलों में प्रसवोत्तर हाइपर थायराइड की समस्या कुछ समय के बाद सामान्य हो जाती है। हालांकि अगर किसी महिला की शरीर में प्रसव के बाद हाइपर थायराइड का स्तर असामान्य है तो उन्हें अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। डॉक्टर थायराइड के स्तर पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ गोलियां दे सकते हैं। इन गोलियों को लेते समय शिशु को स्तनपान कराना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसके अलावा डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) ज्यादा होने पर डॉक्टर आपको अॉपरेशन या रेडियोएक्टिव थेरेपी की सलाह दे सकते हैं। इनसे स्तनपान और शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

      डिलीवरी के बाद थायराइड होने पर क्या सावधानियां बरतें? (delivery ke baad thyroid hone par kya savdhani barte)

      • अगर डिलीवरी की बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या है तो डॉक्टर की सलाह पर ही दवाइयां लें।
      • नियमित रूप से अपने थायराइड के स्तर की जांच कराएं।
      • प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) की दवाइयों से आपको एलर्जी हो सकती है, जिनमें त्वचा में खुजली, आंखों में जलन, बाल झड़ना आदि आम है। अगर दवाइयों से आपको इनमें से किसी प्रकार की एलर्जी हो रही है तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
      • डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) को नियंत्रण में रखने के लिए अपने दिनचर्या में सुधार करें।
      • प्रसवोत्तर थायराइड होने की स्थिति में डॉक्टर की सलाह से संतुलित भोजन लें।
      • प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) है तो तनाव से दूर रहें।
      प्रसव के बाद महिलाओं में थायरायड हार्मोन का स्तर बढ़ने या घटने से उन्हें कई प्रकार की समस्याएं, जैसे तनाव, चिड़चिड़ापन, थकान आदि हो सकती हैं, इसीलिए अपनी थायराइड की समस्या की निगरानी बेहद जरूरी है। इस ब्लॉग में प्रसवोत्तर थायराइड की समस्या से जुड़ी सभी जानकारी दी गई है। डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) (Thyroid Problem in Pregnancy) की समस्या से जूझ रहीं महिलाओं को इससे जुड़ी किसी अन्य जानकारी के लिए अपने डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

      Mar 4, 2019

      March 04, 2019

      प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem

      गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जिसमेंं त्वचा संबंधी समस्याएं भी शामिल हैं। यूं तो प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem (skin problems in pregnancy) सामान्य है, लेकिन महिलाओं के लिए यह समस्या शारीरिक परेशानी से ज्यादा मानसिक तनाव है।


        महिलाओं के इसी मानसिक तनाव को दूर करने के लिए हम कुछ महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहे हैं, जिनकी मदद से गर्भावस्था के दौरान महिलाएं त्वचा संबंधी समस्याओं से बच सकती हैं।

        गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याएं क्यों होती है (Pregnancy me skin problems kyun hoti hai)


        skin problem during pregnancy

        कुछ ही महिलाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याएं (skin problems in pregnancy in Hindi) नहीं होती बल्कि उनकी त्वचा चमकती रहती है, वरना ज्यादातर महिलाओं को त्वचा संबंधी समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है।
        गर्भावस्था में त्वचा संबंधी समस्याएं (skin problems in pregnancy in Hindi) सामान्य होती हैं, लेकिन किसी किसी के लिए यह समस्या गंभीर हो जाती है।

        दरअसल, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से महिलाओं को ढेर सारी त्वचा संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ता है। प्रेगनेंसी के समय पेट बाहर आने की वजह से भी त्वचा में कई तरह के बदलाव होते हैं, ऐसे में हम बता रहे हैं कि आखिर प्रेगेंसी के समय महिलाओं को किन किन त्वचा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
        • त्वचा पर मुंहासों का होना
        • पेट और जांघों पर स्ट्रेच मार्क्स की समस्या होना
        • त्वचा पर खुजली होना
        • त्वचा का रंग बदल जाना

        गर्भावस्था के दौरान मुंहासे क्यों होते हैं? (Pregnancy ke samay muhase kyun hote hai)

        acne during pregnancy

        गर्भावस्था में मुंहासे होना बेहद सामान्य है, जिससे ज्यादातर महिलाएं जूझती हैं। दरअसल, गर्भावस्था के समय तेल की ग्रथिंया बहुत ही ज्यादा तेल का स्त्राव करती हैं, ऐसे में मुंहासें होना स्वभाविक है। ज्यादातर मामलों मेंं यह ठोडी के आसपास होते हैं, लेकिन कुछ महिलाओं के पूरे चेहरे पर फैल जाते हैं। (Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

        अगर मुंहासों का सही तरह से उपचार नहीं किया जाए तो यह प्रसव के बाद भी बरकरार रहते हैं, इसलिए शुरूआत से ही इनकी रोकथाम करना जरूरी है। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के समय मुंहासों से बचने के लिए क्या करना चाहिए।

        गर्भावस्था में ब्लीडिंग क्यों होती है? (Pregnancy me bleeding kyun hoti hai)

        गर्भावस्था के दौरान मुंहासे निकलने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay muhase nikalne se kaise roke)

        मुंहासों से बचने के लिए दिन में तीन से चार बार चेहरे को धोना चाहिए। चेहरे को बार बार धोने से त्वचा से तेल कम होेने लगता है, जिससे मुंहासे कम हो जाते हैं। तो चलिए जानते हैं कि मुंहासों को रोकने के घरेलू उपाय क्या है।
        • तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल - मुंहासों को कम करने के लिए तुलसी के पत्ते को गुलाबजल में मिलाकर चेहरे पर लगाना चाहिए।
        • नींबू के रस का इस्तेमाल - नींबू के रस में गुलाब जल की कुछ बूंदे मिलाकर चेहरे पर लगाने से मुंहासे कम हो जाते हैं।
        • संतरे के रस का इस्तेमाल - एक चम्मच शहद में थोड़ा संतरे का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से मुंहासें धीरे धीरे कम होने लगते हैं।
        • हल्दी का इस्तेमाल - हल्दी का इस्तेमाल करने से मुंहासे कम होने लगते हैं, ऐसे में हल्दी में नीम के पत्तों को मिलाकर पीस लें, इसके बाद इसे चेहरे पर लगाएं, 15 मिनट के बाद इसे धो लें।

        गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स क्यों होते हैं? (Garbhavastha ke samay stretch marks kyun hote hai)

        stretch marks during pregnancy

        गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स का होना बेहद सामान्य है, लेकिन ये उन्हीं महिलाओं को ज्यादा होते हैं, जिनका वजन सामान्य से अधिक बढ़ता है। दरअसल, वजन बढ़ने की वजह से पेट पर धीरे धीरे निशान बनने लगते हैं, जोकि प्रेगनेंसी के बाद गहरे हो जाते हैं। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स से बचने के लिए क्या कर सकते हैं।

        गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay stretch marks hone se kaise roke)

        गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स से बचाव के लिए विटामिन ई क्रीम या तेल से पेट पर हल्के से मसाज करनी चाहिए। इसके अलावा अंडे का सफेद हिस्सा प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से भी स्ट्रेच मार्क्स की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। स्ट्रेच मार्क्स तभी जाते हैं जब वो लाल रंग के हो, सफेद रंग के होने नहीं जाते हैं। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

        गर्भावस्था में स्किन काली क्यों हो जाती है? (Pregnancy ke dauran skin kali kyun ho jati hai)

        skin blackness during pregnancy

        गर्भवती होने का पहला लक्षण त्वचा का रंग बदलकर गहरा हो जाना हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के निप्पल के पास गहरा काला घेरा बनता है, जिसे हर तीन में से दो गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी की शुरूआत से ही महसूस करती हैं।
        दरअसल, निप्पल ही नहीं बल्कि जांघ, नाभी, गले आदि जगहों का रंग पहले से बदलकर गहरा हो जाता है, जिसे क्लोस्मा या मेलास्मा (closma or melasma in Hindi) भी कहते हैं।

        गौरतलब है कि इस दौरान महिलाओं की त्वचा में लाल रंग के चकते भी पड़ते हैं, जिसकी वजह से महिला को टेंशन हो जाती है। हालांकि, स्किन का गहरा रंग प्रसव के बाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है, लेकिन फिर भी इसका रोकथाम करना जरूरी है।

        गर्भावस्था के दौरान स्किन काली होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay skin kali hone se kaise roke)

        सूर्य की तेज़ किरणों से त्वचा का रंग लाल, भूरा या काला हो जाता है, इसलिए गर्भावस्था के दौरान धूप से जितना हो सके उतना बचना चाहिए। जब भी बाहर जाना हो, तो सनस्क्रीन क्रीम लगाकर ही जाएं, इससे त्वचा सुरक्षित रहती है। त्वचा पर किसी भी तरह का लोशन या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

        गर्भावस्था में पेट का निचला हिस्सा रूखा क्योंं हो जाता है? (Garbhavastha me pet ke nichala hisse me rukhapan kyun hota hai)

        roughness during pregnancy

        प्रेगनेंसी में शिशु के विकास से पेट का आकार बढ़ता है, जिससे पेट में खिंचाव होता है। खिंचाव होने की वजह से पेट के निचले हिस्से में रूखापन महसूस होता है, इसलिए खुजली भी होने लगती है। पेट के निचले हिस्से के रूखेपन के साथ अगर खुजली भी हो रही है, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं।

        गर्भावस्था के दौरान पेट का निचला हिस्सा रूखा होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay pet ke nichale hisse me rukhapan hone se kaise roke)

        गर्भवती महिलाएं पेट के निचले हिस्से के रूखेपन को कम करने के लिए क्रीम का इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन ध्यान रहे कि क्रीम हल्के हाथों से ही लगाएं। इसके अलावा दिन मेंं 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए, इससे त्वचा मेंं नमी बरकरार रहती है।

        गर्भावस्था के दौरान झाइयां और मस्सों की समस्या (Pregnancy ke samay jhaiya and masso ki samsya)


        warts during pregnancy

        प्रेगनेंसी के समय झाइयां और मस्सों का होना सामान्य है। गर्भावस्था के दौरान 50 प्रतिशत महिलाएं झाइयां और मस्सों का सामना करती हैं। दरअसल, गर्भावस्था में हार्मोनल बदलाव की वजह से निप्पल, चेहरे, गले, जांघ आदि जगहों पर झाइयां और मस्सों की समस्या होती है, जोकि प्रेगनेंसी के बाद अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

        Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

        गर्भावस्था के दौरान झाइयां और मस्सें होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay jhaiya and masse hone se kaise roke)

        प्रेगनेंसी के समय झाइयों औऱ मस्सोंं से बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन अगर आपको इस तरह की कोई परेशानी हो, तो डॉक्टर से एक बार जरूर संपर्क कर लें। इस समस्या से बचने के लिए गर्भावस्था में साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

        गर्भावस्था में वैरिकोज वेन्स की समस्या क्यों होती है? (Garbhavastha me varicose veins ki samsya kyun hoti hai)

        varicose in pregnancy

        गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याओं मेंं वैरिकोज वेन्स (varicose veins in Hindi) भी शामिल है। वैरिकोज वेन्स (varicose veins in Hindi) की वजह से गर्भवती महिलाओं के पैरो की नसें उभरने लगती हैं, जो त्वचा पर साफ साफ दिखाई देती हैं, जिसके कारण उनके पैरो में काफी दर्द होता है।

        दरअसल, प्रेगनेंसी के दौरान रक्त प्रवाह भारी मात्रा में होता है, जिसकी वजह से वैरिकोज वेन्स (varicose veins in Hindi) की समस्या होती है। इसके अलावा अगर गर्भवती महिला के घर में कोई सदस्य पहले से ही वैरिकोज वेन्स (varicose veins in Hindi) से पीड़ित है, तो इसकी संभावना ज्यादा हो जाती हैं।

        गर्भावस्था के दौरान वैरिकोज वेन्स होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay varicose veins hone se kaise roke)

        वैरिकोज वेन्स (varicose veins in Hindi) की समस्या से बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं को लगातार बैठे या खड़े नहीं रहना चाहिए, और थोड़ी थोड़ी देर बाद टहलते रहना चाहिए। कामकाजी महिलाएं ऑफिस में कुर्सी पर बैठते वक्त पैरों को किसी टेबल के सहारे रखें, ताकि दवाब ज्यादा न हो।

        गर्भावस्था में खुजली क्योंं होती है? (Pregnancy me khujli kyun hoti hai)


        itching-during-pregnancy-hindi

        गर्भावस्था में पेट का आकार बढ़ने की वजह से खुजली की समस्या भी हो सकती है। खुजली की समस्या यूं तो बेहद आम होती है, लेकिन कुछ मामलों में लिवर खराब होने की वजह से भी खुजली होती है, इसलिए खुजली की ज्यादा समस्या होने पर डॉक्टर से जरूर संपर्क कर लेना चाहिए।

        गर्भावस्था के दौरान खुजली होने से कैसे रोकें (pregnancy ke samay khujli hone se kaise roke)

        खुजली को रोकने के लिए क्रीम का इस्तेमाल करें या फिर नारियल के तेल से हल्की मालिश करें। इसके अलावा रोज़ाना शरीर को अच्छे से साफ करना चाहिए, ताकि गंदगी की वजह से खुजली की समस्या न हो। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल कैसे करें? (Garbhavastha me skin ki dekhbhal kaise kare)


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        कुछ महिलाएं तो यह मान लेती हैं कि गर्भावस्था के समय वह खूबसूरत नहीं दिख सकती हैं क्योंंकि उन्हें स्किन संबंधी समस्याएं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, गर्भावस्था के दौरान महिलाएं सामान्य दिनों से ज्यादा खूबसूरत दिख सकती हैं, जिसके लिए उन्हें त्वचा की देखभाल करने की जरूरत होती है। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान त्वचा की देखभाल कैसे कर सकते हैं।

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: त्वचा को साफ रखें (skin care during pregnancy in hindi: skin ko saf rakhe)

        स्किन की समस्याओं से बचने के लिए त्वचा की साफ सफाई करनी जरूरी है। दिन में तीन से चार बार चेहरे को साफ करना चाहिए। त्वचा को साफ करने के लिए आप जो उत्पाद इस्तेमाल करती हैं, वहीं करें।

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: भरपूर नींद लें (skin care during pregnancy in hindi: neend complete kare)

        गर्भवती महिलाएं सामान्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा थक जाती हैं, जिसकी वजह से उन्हें पर्याप्त मात्रा में नींद लेनी की जरूरत है।

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: खूब पानी पीयें (skin care during pregnancy in hindi: khub paani piye)

        त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए गर्भवती महिलाओं को दिन मेंं 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए। पानी त्वचा को नम बनाये रखता है, जिससे त्वचा संबंधी तमाम समस्याएं दूर होती है।

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: तेज़ धूप में जाने से बचे (skin care during pregnancy in hindi: tej dhup me jane se bache)

        गर्भवती महिलाओं को तेज़ धूप में जाने से बचना चाहिए, क्योंकि सूर्य की तेज किरणों से त्वचा का रंग परिवर्तन हो जाता है। जब भी धूप में निकलना हो, तो सनस्क्रीन क्रीम लगाना बिल्कुल न भूलें। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

        गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: खुश रहें (skin care during pregnancy in hindi: khus rahe)

        गर्भावस्था में चमकती त्वचा के लिए क्रीम लगाने के साथ साथ खुश भी रहना चाहिए, क्योंकि खुश रहने से त्वचा में चमक होने के साथ ही स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

        महिलाएं गर्भावस्था के समय ऊपर लिखे सुझावों से खुद को स्किन समस्याओं से बचा सकती हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान महिलाएं को स्किन के बारे में चिंता करना छोड़कर अपने आने वाले शिशु के बारे में अच्छे से सोचना चाहिए।

        Mar 2, 2019

        March 02, 2019

        Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

        हर महिला के लिए मां बनने की खुशी सबसे अनमोल खुशी होती है। जैसे ही एक महिला गर्भधारण करती है तो उसे शिशु के इस दुनिया में आने की उत्सुकता काफी बढ़ जाती है। प्रेगनेंसी के इन नौ महीनों में महिला के शरीर में काफी बदलाव होते हैं। गर्भ में बच्चे का विकास जिस तरह होना शुरू होता है इसी के साथ-साथ तमाम तरह के शारीरिक बदलाव होते हैं। महीने दर महीने (pregnancy month by month baby growth in Hindi) होने वाले गर्भ में बच्चे के विकास (Fetal development in Hindi) को मां पूरी तरह अनुभव करती है और गर्भावस्था की सबसे सुखद यात्रा का सुखद अनुभव लेती है। भले ही इन नौ महीनों में महिला काफी सारी शारीरिक तकलीफों से भी गुज़रती है लेकिन शिशु का इस दुनिया में आना और उसका पहला स्पर्श पाना मां के लिए इन तमाम तकलीफों को कम कर देता है। लेकिन जब शिशु गर्भ में होता है तो हर मां को इस बात के जानने की काफी उत्सुकता रहती है कि अब मेरा शिशु कितना बड़ा हो गया होगा, अब उसके किस अंग का विकास हुआ होगा, अब शिशु क्या-क्या महसूस कर सकता है आदि। गर्भ में बच्चे के विकास को अंग्रेजी में फीटल डवलप्मेंट (Fetal development) कहा जाता है। शिशु के विकास की इस प्रक्रिया को महीने दर महीने के हिसाब से आप अच्छी तरह समझ सकती हैं। आज हम इस ब्लॉग में आपको हर महीने के हिसाब से गर्भ में बच्चे का विकास की प्रतिक्रिया बताएंगे !



          pregnancy month by month baby growth in Hindi


          पहले महीने के दौरान गर्भ में बच्चे का विकास कैसे होता है? (Pregnancy month by month in Hindi)


          गर्भावस्था का पहला महीना ऐसा होता है जिसमें खुद महिला को ही नहीं पता होता कि वो गर्भवती है। लेकिन बच्चे के इस विकास की प्रक्रिया आपके आखिरी मासिक धर्म (पीरियड्स) के खत्म होने के पहले दिन से ही शुरू हो जाती है। इस दौरान गर्भाशय में एम्नियोटिक थैली (Amniotic sac in Hindi) का निर्माण होता है जो गर्भधारण के समय बनती है। इसी में ही शिशु का विकास होता है और पहली तिमाही में यहीं पर ही प्लेसेंटा (placenta in Hindi) भी बनती है। आपको बता दें कि प्लेसेंटा गोल और चपटी नाल है जिसके ज़रिए मां के पोषक तत्व शिशु तक पहुंचते हैं और बच्चे का मल भी इसी के ज़रिये बाहर निकलता हैं।
          • पहले महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस दौरान बच्चे की आंख से शुरुआत होकर उसका मुंह, जबड़ा और गले का विकास होने लगता है।
            • पहले महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के पहले महीने में शिशु की रक्त कोशिकाएं (blood cells in Hindi) और रक्त संचार शुरू होने लगता है।
          • पहले महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के पहले महीने में आपका बच्चा बिल्कुल चावल के दाने के आकार का होता है।
            • गर्भावस्था के पहले महीने के अंत तक अब आपका शिशु 6 से 7 मिमी. (1/4 इंच) लंबा हो जाता है।

          गर्भावस्था के दूसरे महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • दूसरे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के दूसरे महीने में शिशु के चहरे के साथ-साथ उसके कान बनने शुरू होंगे।
            • हाथों के स्थान पर अब उभार आने शुरू हो जाते हैं।
            • पैर और पैरों की उंगलियां बनने की भी शुरुआत हो जाती है।
          • दूसरे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • शिशु का मस्तिष्क, नर्वस सिस्टम, पाचन तंत्र, रीढ़ की हड्डी आदि इस महीने में विकसित होते हैं।
            • जो हड्डियां नरम होती हैं, इस महीने में वो कड़ी होनी शुरू हो जाती हैं।
            • इसके अलावा आपको दूसरे महीने के आखिरी चरण तक अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) में फीटल पोल (fetal pole) भी नज़र आएगा।
          • दूसरे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • शिशु हलचल करना शुरू कर देता है लेकिन बच्चे के लात मारने की हलचल को मां महसूस नहीं कर पाती।
          • दूसरे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • दूसरे महीने के अंत तक आपका शिशु लगभग 2.54 सेमी (एक इंच) लंबा और गर्भ में बच्चे का वज़न लगभग 9.54 ग्राम हो जाता है।

          गर्भावस्था के तीसरे महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • तीसरे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के तीसरे महीने के खत्म होने तक आपके शिशु के अंग पूरी तरह विकसित हो चुके होते हैं।
            • तीसरे महीने तक शिशु के हाथ, पैर, पैरों की उंगलियां पूरी तरह बन चुकी होती हैं।
            • इस महीने उसके दांत बनने शुरू हो जाते हैं।
            • उसके बाहर के कान और नाखून भी बन चुके होते हैं।
            • इसके अलावा शिशु के गुप्त अंग भी विकसित होने शुरू हो जाते हैं लेकिन इस महीने में शिशु के लिंग का पता नहीं लगाया जा सकता।
          • तीसरे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • शिशु के शरीर में नसें बन चुकी हैं और पेशाब करने का रास्ता भी बन चुका है।
          • तीसरे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • शिशु अब अपनी मुट्ठी को खोल बंद कर सकता है।
          • तीसरे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • तीसरे महीने के अंत तक आपका शिशु 7.6 से 10 सेमी (करीब 4 इंच) तक लंबा होगा और गर्भ में बच्चे का वज़न करीब 28 ग्राम हो जाता है।

          गर्भावस्था के चौथे महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)


          अब गर्भावस्था का चौथा महीना यानी दूसरी तिमाही की शुरुआत हो चुकी है। इस महीने तक आपके बच्चे का काफी विकास हो चुका होता है।
          • चौथे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस महीने में शिशु की पलकें, आइब्रो, नाखूनों का विकास होने लगता है।
            • वहीं शिशु के गुप्त अंग भी अच्छी तरह विकसित हो जाते हैं।
            • इस महीने में आप चाहें तो डॉप्लर की सहायता से शिशु की दिल धड़कनें भी सुन सकती हैं - डॉप्लर अल्ट्रासाउंड (Doppler scan) स्कैन का ही एक प्रकार है जिससे गर्भ में शिशु के स्वास्थ्य का पता लगाया जाता है, इसके ज़रिए आप शिशु के दिल की धड़कन (baby ki heartbeat) भी सुन सकती हैं।
          • चौथे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इसके अलावा अब बच्चा अंगूठा चूस सकता है, अंगड़ाई ले सकता है और उबासी भी ले सकता है
          • चौथे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • महीने के अंत तक शिशु छह इंच लंबा (15 सेमी.) और गर्भ में बच्चे का वज़न 112 ग्राम हो जाता है।

          गर्भावस्था के पांचवे महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • पांचवे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के पांचवे महीने में शिशु के सिर पर बाल और कंधे, पीठ और माथे पर पतले और मुलायम बाल आने लगते हैं जो बच्चे की रक्षा करते हैं। जन्म के एक सप्ताह बाद ही ये बाल झड़ना शुरू हो जाते हैं।
            • इसके अलावा शिशु की त्वचा पर एक सफेद परत आ जाती है जिसे वर्निक्स कैसेओस (vernix caseosa in Hindi) कहा जाता है। यह परत शिशु की रक्षा उस समय करती है जब जन्म से पहले एम्नियोटिक द्रव (amniotic fluid) धीरे-धीेर खत्म होने लगता है।
          • पांचवे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस महीने में शिशु की मांसपेशियां विकसित हो चुकी होती हैं।
          • पांचवे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • यही वो महीना है जिसमें आप अपने शिशु की हलचल महसूस करना शुरू कर देती हैं। अब शिशु अंगड़ाइयां लेना शुरू कर देता है।
          • पांचवे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के पांचवे महीने के अंत तक शिशु 25 सेमी. (10 इंच) लंबा हो जाता है और गर्भ में बच्चे का वज़न लगभग 400 ग्राम हो जाता है।

          गर्भावस्था के छठे महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • छठे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस महीने में शिशु की त्वचा लाल रंग की हो जाती है और वह झुर्रीदार हो जाती है।
            • पारदर्शी त्वचा पर नसें साफ नज़र आने लगती हैं।
            • अब शिशु के हाथों और पैरों की उंगलियों पर निशान (फिंगर प्रिंट्स - finger prints in Hindi) बनने लगते हैं।
          • छठे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • अब उसकी आंखें खुलने लगती हैं।
            • इस महीने में शिशु की हलचल बढ़ जाती है और वो हिचकियां भी ले सकता हैं।
            • शिशु के हिचकियां लेने पर आपको पेट में झटके का अहसास हो सकता है।
            • सोनोग्राफी के ज़रिये आप बच्चे की हलचल देख पाएंगी।
          • छठे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था का छठा महीना यानी दूसरी तिमाही का आखिरी महीना जिसमें आपका शिशु 30 सेमी. लंबा (12 इंच) और अब गर्भ में बच्चे का वज़न करीब एक किलो हो जाता है।

          गर्भावस्था के सातवें महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • सातवें महीने में शिशु का आंतरिक विकास
            • गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में शिशु के शरीर में वसा (फैट) बननी शुरू हो जाती है।
          • सातवें महीने में शिशु की हलचल
            • इस महीने में आपका शिशु करवट ले सकता है और अब उसके सुनने की क्षमता विकसित हो चुकी है। इस महीने में शिशु बाहर की आवाज़ों और रोशनी होने पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है
          • सातवें महीने में शिशु का आकार
            • इस दौरान बच्चा 36 सेमी. (14 इंच) लंबा और गर्भ में बच्चे का वज़न एक से दो किलो का हो सकता है।

          गर्भावस्था के आठवें महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)

          • आठवें महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • उसके अंदर के अंगों का विकास हो चुका है लेकिन अभी भी फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं
          • आठवें महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस महीने में भी शिशु में वसा (फैट) बननी जारी रहती है।
            • इस महीने में शिशु के मस्तिष्क का लगातार विकास होता है और अब उसकी देखने और सुनने की क्षमता पूरी तरह विकसित हो चुकी है।
          • आठवें महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इसके साथ ही इस माह में आपको शिशु का लात मारना (baby kick - baby movement in pregnancy in Hindi) भी महसूस होगी।
          इस महीने में शिशु की हलचल आपको साफ महसूस होने लगेगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस महीने तक शिशु का काफी हद तक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास) हो चुका होता है और उसे गर्भ में जगह कम पड़ने लगती है। आप अल्ट्रासाउंड के ज़रिये शिशु की हरकत को देख भी सकती हैं। लेकिन आपको बता दें कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि शिशु हमेशा ही हलचल करता रहे। वो आराम भी करेगा। इसलिए अगर अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) में शिशु हरकत करता नज़र ना आए तो आप परेशान ना हों। हो सकता है शिशु सो रहा हो।
          • आठवें महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • आपका शिशु 46 सेमी. (18 इंच) का हो जाता है और गर्भ में बच्चे का वज़न 2.27 किलो हो जाता है।

          गर्भावस्था के नौवें महीने में बच्चे का विकास (Pregnancy month by month in Hindi)


          गर्भावस्था का नौवा महीना शुरू हो गया है और पूरा बन चुका है, बस उसके फेफड़े विकसित होने बाकी हैं। अब ज्यादा समय नहीं है आपके शिशु के इस दुनिया में आने का।
          • नौवें महीने में शिशु की गतिविधि (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • इस महीने में शिशु अपनी पॉजिशन बदल लेता है और उसका सिर नीचे की ओर जन्म देने वाली नलिका में आ जाता है।
          • नौवें महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
            • गर्भावस्था के आखिरी माह तक उसका वज़न 3.2 किलो और उसकी लंबाई 50 इंच (18 से 20 इंच) हो जाती है।

          गर्भ में शिशु का लिंग पता लगाना - लड़का है या लड़की - How to know boy or girl during pregnancy at home


          यूं तो आजकल के लोग लिंग भेद को लेकर काफी जागरुक हो गए हैं और अब लड़का और लड़की का भेद ना करके दोनों का खुले दिल से स्वागत करते हैं। लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि कुछ लोग वाकई में गर्भ में लड़का या लड़की के होने का पता लगाने के लिए टेस्ट करवाने की चाह रखते हैं। आपको बता दें कि गर्भ में शिशु का लिंग जानना एक कानूनी अपराध है और ऐसा करने पर आपको सज़ा भी हो सकती है। ज़रा सोचिए कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक संतान पाने के लिए न जाने कितनी दुआएं मांगते हैं लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें संतान सुख नहीं मिल पाता। ऐसे में वो बस चाहते हैं कि उन्हें किसी तरह से एक बार संतान सुख मिल जाए। ऐसे में लड़का और लड़की के बीच आज भी फर्क करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि ईश्वर ने उनको बहुत सौभाग्यशाली बनाया है जो उनको जल्द ही संतान सुख मिलने वाला है, और आज लड़का और लड़की दोनों बराबर हैं। इसलिए गर्भ में शिशु के लिंग जानने की, लड़का कैसे पैदा करें आदि बातों के बारे में सोचना छोड़ें और भगवान के दिए इस वरदान का दिल खोलकर स्वागत करें। चाहे लड़का हो या लड़की, आप दोनों के लिए खुद को तैयार करें और उसके अच्छे भविष्य की योजना बनाएं। चूंकि हर मां के लिए गर्भावस्था का समय काफी खुशनुमा होता है और बच्चे की हर गतिविधि, उसके विकास को जानने की इच्छा उनमें रहती ही है। आप डॉक्टर की मदद से और अपने खुद के अनुभव से गर्भ में बच्चे का विकास महसूस कर पाएंगी। आप खुश रहें, अच्छा खानपान खाएं और गर्भावस्था के हर पल का आनंद उठाएं।

          Feb 23, 2019

          February 23, 2019

          Pregnancy me bleeding ke karan or upay

          गर्भावस्था में योनि से ब्लीडिंग (Pregnancy me Bleeding) : कारण, लक्षण और ब्लीडिंग कम करने के उपाय (Garbhavastha me yoni se bleeding : karan, lakshan aur bleeding kam karne ke upay)

          Pregnancy me Bleeding गर्भावस्था में योनि से ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding) तकरीबन 20 से 30 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को होती है। यह समस्या पहली तिमाही में सामान्य है, लेकिन कुछ मामलों में गर्भपात (miscarriage in hindi) की वजह से भी गर्भावस्था में ब्लीडिंग हो सकती है। गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) होने पर कई महिलाएं बहुत चितिंत हो जाती हैं कि गर्भ मेें बच्चा ठीक है या नहीं। इस ब्लॉग में हम आपको गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona in hindi) से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।



            Pregnancy me Bleeding | गर्भावस्था में ब्लीडिंग


            गर्भावस्था में ब्लीडिंग क्यों होती है? (Pregnancy me bleeding kyun hoti hai) 

            योनि से होने वाले हल्के रक्तस्त्राव को ब्लीडिंग और रक्त के हल्कें धब्बों को स्पॉटिंग कहते हैं। इस दौरान खून का रंग लाल से भूरा हो सकता है। गर्भावस्था की शुरूआत मेंं जब भ्रूण गर्भाशय की दीवार पर प्रत्यारोपित (implantation in hindi) होता है, तब ब्लीडिंग होती है और यह सामान्य है, लेकिन गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में ब्लीडिंग होने का कारण समय से पूर्व डिलीवरी (premature delivery in hindi) हो सकता है। अक्सर गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था के पहले, दूसरे और तीसरे महीने में ब्लीडिंग या स्पॉटिंग से पीड़ित होती हैं। गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) या स्पॉटिंग के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनकी चर्चा नीचे की गई है -
            • प्रत्यारोपित (implantation in hindi) - गर्भावस्था की शुरूआत में जब भ्रूण गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है, तब महिलाओं को 6 से 12 दिनों तक स्पॉटिंग या ब्लीडिंग होती है। कई महिलाएं इसे नज़रअंदाज़ कर देती हैं, क्योंकि वे इसे पीरियड्स मान लेती हैं।
            • गर्भपात (miscarriage in hindi) - गर्भपात (miscarriage in hindi) शारीरिक चोट, मूत्रमार्ग या गर्भाशय में संक्रमण आदि की वजह से हो सकता है, ऐसा होने पर गर्भावस्था में ब्लीडिंग (bleeding during pregnancy in hindi) हो सकती है।
            • योनि में संक्रमण (vaginal infection in hindi) - गर्भवती महिलाओं की योनि में इन्फेक्शन (infection in hindi) होने की वजह से गर्भावस्था में ब्लीडिंग हो सकती है।
            • एक्टोपिक प्रेगनेंसी (ectopic pregnancy in hindi) - एक्टोपिक प्रेगनेंसी (ectopic pregnancy in hindi) में शिशु गर्भाशय से बाहर फैलोपियन ट्यूब (fallopian tube in hindi) में होता है, इससे फैलोपियन ट्यूब टूट सकती है और गर्भवती को ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है। यह गर्भावस्था की पहली तिमाही में हो सकता है।
            • मोलर प्रेगनेंसी (molar pregnancy in hindi) - यदि मोलर प्रेगनेंसी (molar pregnancy in hindi) है, तो अल्ट्रासाउंड (ultrasound in hindi) के वक्त गर्भवती महिलाएं शिशु की जगह एक असामान्य उत्तक देख सकती हैं। यह जानलेवा नहीं होता है, लेकिन कई गंभीर मामलों में यह कैंसर की वजह बन सकता है। मोलर प्रेगनेेंसी (molar pregnancy in hindi) की वजह से ब्लीडिंग हो सकती है।
            • सेक्स करना - कई बार प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) करने की वजह से भी योनि से रक्तस्त्राव हो सकता है।
            • गर्भाशय का फटना - गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में गर्भाशय के फटने से बच्चा पेट की तरफ खिसक जाता है, जोकि काफी जटिल समस्या है। गर्भाशय के फटने की वजह से ब्लीडिंग हो सकती है।
            • गर्भनाल का टूटना - गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में गर्भनाल के टूटने से ब्लीडिंग काफी ज्यादा होती है। हालांकि, यह लगभग 200 महिलाओं में से किसी एक के साथ ही होता है। यह स्थिति तब बन सकती है, जब गर्भ में एक से ज्यादा शिशु हो।
            • हार्मोनल बदलाव - पीरियड्स नियंत्रित करने वाले हार्मोन्स में बदलाव की वजह से भी गर्भावस्था में ब्लीडिंग हो सकती है। हार्मोनल बदलाव से होने वाली ब्लीडिंग उसी समय होती है, जब आपके पीरियड्स की डेट हो।
            • समय से पूर्व डिलीवरी (premature delivery in hindi) अगर गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में ब्लीडिंग हो रही है, तो यह समय से पूर्व डिलीवरी (premature delivery in hindi) की वजह हो सकती है।

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग होने पर क्या करना चाहिए? (Garbhavastha me bleeding hone par kya karna chahiye) 

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) होने पर इसकी वजह जानने के लिए आपको फौरन डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा अगर आपका ब्लड प्रेशर (बीपी) ज्यादा हो तो इसे कम करने के लिए डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग होने पर शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? (Pregnancy me bleeding hone par sharir par kya prabhav padta hai) 

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) होने की वजह से महिलाओं के शरीर पर कई प्रभाव पड़ते हैं, जिनमें से कुछ नीचे लिखे गये हैं -
            • अधिक थकान महसूस होना।
            • ज्यादा प्यास लगना।
            • खून की कमी (anemia in hindi) होना।
            • चक्कर आना।
            • दिल की धड़कनें तेज़ होना।
            • बेहोश होना।
            • पेट में तेज़ दर्द होना।

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग होने का निदान क्या है? (Garbhavastha me bleeding hone ka nidan kya hai) 

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) होने पर डॉक्टर अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह देते हैं, ताकि वो यह पता लगा सकें कि कहीं ऐसा एक्टोपिक प्रेगनेंसी (ectopic pregnancy in hindi) की वजह से तो नहीं हो रहा है। इसके अलावा डॉक्टर खून और पेशाब की जांच कराने के लिए भी कहते हैं, इससे संक्रमण का पता लगाया जाता है।

            Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग होने का इलाज क्या है? (Pregnancy me bleeding hone ka ilaj kya hai) 


            गर्भावस्था में ब्लीडिंग (pregnancy me bleeding hona) होने के कारणों का पता लगाने के बाद डॉक्टर निम्नलिखित आधार पर आपका इलाज कर सकते हैं -
            • अगर गर्भपात की वजह से ब्लीडिंग हो रही है, तो डॉक्टर आपको आराम करने की सलाह देते हैं। इसके अलावा डॉक्टर आपको तीन हफ्ते तक सेक्स करने के लिए मना करते हैं।
            • अगर अल्ट्रासाउंड (ultrasound in hindi) मेंं ब्लीडिंग की वजह एक्टोपिक प्रेगनेंसी सामने आती है, तो डॉक्टर सर्जरी कराने की सलाह देते हैं।
            • गर्भावस्था के आखिरी दिनों में अगर ब्लीडिंग हो रही है, तो डॉक्टर खून चढ़ाते हैं और कितना खून चढ़ता है, यह आपके और आपके शिशु के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
            • अगर गर्भाशय या गर्भनाल फटने की वजह से ब्लीडिंग हो रही है, तो डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करते हैं। इस दौरान गर्भाशय को बाहर निकाल दिया जाता है, लेकिन अगर आप और बच्चे पैदा करना चाहती हैं, तो सर्जन इसे ठीक कर सकते हैं।

            गर्भावस्था में ब्लीडिंग को रोकने के घरेलू उपाय क्या हैं? (Pregnancy me bleeding rokane ke gharelu upay kya hai) 

            प्रेगनेंसी की शुरूआत में अगर गर्भवती महिलाओं को ब्लीडिंग हो रही है, तो वह नीचे लिखे उपायों को अपना सकती हैं -
            • भरपूर मात्रा में आराम करें।
            • भारी सामान उठाने से बचें।
            • सेक्स ना करें।
            • खूब पानी पीएं।
            • पैड्स का इस्तेमाल करें।
            ध्यान दें -प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में हल्की स्पॉटिंग होना सामान्य है, लेकिन अगर ब्लीडिंग ज्यादा हो तो डॉक्टर के पास तुरंत जाएं। अगर प्रेगनेंसी के आखिरी दिनों में ब्लीडिंग हो रही है, तो आपको फौरन डॉक्टर के पास जाना चाहिए, क्योंकि इसका कोई घरेलू इलाज नहीं है।

            क्या गर्भावस्था में ब्लीडिंग होना गर्भवती महिला के लिए हानिकारक है? (Kya garbhavastha me bleeding hona garbhvati mahila ke liye hanikark hai) 


            गर्भावस्था में अधिक ब्लीडिंग होने की वजह से महिला को निम्नलिखित परेशानियां हो सकती हैं -
            • अगर ब्लीडिंग मोलर प्रेगनेंसी की वजह से हो रही है, तो इससे गर्भवती महिला को कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।
            • अगर ब्लीडिंग प्लेंसटा के टूटने की वजह से हो रही है, तो इससे गर्भवती महिला की मौत हो सकती है।
            • गर्भावस्था में ज्यादा ब्लीडिंग होने की वजह से एनीमिया यानि गर्भवती महिला में खून की कमी हो जाती है।

            क्या गर्भावस्था में ब्लीडिंग होना बेबी के लिए हानिकारक है? (Kya garbhavastha me bleeding hona baby ke liye hanikark hai) 

            गर्भावस्था में ज्यादा ब्लीडिंग होने की वजह से शिशु को नीचे लिखी गई स्थितियों में नुकसान हो सकता है -
            • अगर ब्लीडिंग ज्यादा हो रही है, तो यह गर्भपात हो सकता है, ऐसे में शिशु की मौत हो जाती है।
            • अगर गर्भनाल के टूटने की वजह से ब्लीडिंग हो रही है तो इससे शिशु की मौत हो सकती है। हालांकि, यह 500 में से किसी एक ही शिशु के साथ होता है।
            अपनी सुविधा के लिए गर्भवती महिलाओं को हमेशा अपने साथ पैड रखने चाहिए, ताकि रक्तस्त्राव होने पर उन्हें कोई परेशानी न हो। गर्भावस्था में ब्लीडिंग (Pregnancy me Bleeding) होने पर आपको घबराना नहीं चाहिए, बल्कि ऊपर बताए गये उपायों को अपनाएं और डॉक्टर से संपर्क करें। प्रेगनेंसी की शुरूआत में ब्लीडिंग नॉर्मल हो सकती है, लेकिन अगर तीसरी तिमाही में ब्लीडिंग हो रही है, तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए, क्योंकि यह समय से पूर्व डिलीवरी या किसी अन्य गंभीर समस्या की वजह से भी हो सकती है।