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Apr 26, 2019

April 26, 2019

Normal Delivery Kaise Hoti Hai

नार्मल डिलीवरी कैसे होती है?


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एक महिला को जैसे ही पता चलता है कि वह गर्भवती (pregnant) है, तो बच्चे के आने का इंतज़ार पहले दिन से ही शुरू हो जाता है। इंतज़ार होता है, अपने नन्हीं-सी जान को अपने सीने से लगाने का, इंतज़ार होता है उसके पहले स्पर्श को महसूस करने का।

उसके पहले स्पर्श के अहसास करने का इंतज़ार नौ महीने की तकलीफों को काफी छोटा बना देता है। गर्भवती होने की खबर से ही महिला को बस डिलीवरी की तारीख का इंतज़ार रहता है। बच्चा कब इस दुनिया में आएगा इसके लिए हर माँ के मन में उत्सुकता बनी रहती है।

ऐसे में महिला को अपनी अनुमानित जन्मतिथि पर ध्यान देना चाहिए। इस तरह आप शिशु की जन्म तिथि का पता लगा सकती हैं।


    डिलीवरी की अनुमानित तिथि कैसे पता लगाएं?

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    ड्यू डेट कैलकुलेटर (due date calculator) से आप अपने शिशु की अनुमानित जन्म तिथि का पता लगा सकती हैं। इसके लिए आपको अपनी पिछली माहवारी को ध्यान में रखना होगा।

    अपनी पिछली महावारी (पीरियड्स) के पहले दिन से शिशु की संभावित जन्म तिथि की गणना कर सकते हैं।
    आपको बता दें कि गर्भावस्था नौ महीने सात दिन तक या 40 सप्ताह तक चलती है।

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    महिला की डिलीवरी की संभावित तिथि जानने के लिए प्रेगनेंसी की इस समय अवधि को अपने पिछले पीरियड की पहली तारीख से जोड़ दें।

    अगर आपको रेगुलर पीरियड होता है और 28 दिनों में होता है, तो यह केलकुलेशन ज़्यादा सटीक परिणाम देती है। डॉक्टर भी इसी आधार पर आपकी डिलीवरी डेट का अनुमान लगाते हैं।
    लेकिन जैसे-जैसे महिला की डिलीवरी की तारीख नज़दीक आती है, उसकी घबराहट काफी बढ़ जाती है। इसका सबसे पहला कारण होता है, डिलीवरी में होने वाला दर्द। इसके अलावा बहुत-सी महिलाओं के मन में इस बात को लेकर भी ख्याल आते हैं कि क्या उनकी नार्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean delivery) के ज़रिये वह शिशु को जन्म देंगी।

    बहुत-सी महिलाएँ नार्मल डिलीवरी के दर्द के डर से बचने के लिए खुद से सिज़ेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन डिलीवरी) कराने का फैसला लेती हैं। लेकिन कुछ महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बंधी दिक्कतों के चलते सिज़ेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन डिलीवरी) कराने के लिए डॉक्टर खुद ही सलाह देते हैं।

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    लेकिन सलाह यही दी जाती है कि अगर किसी तरह की मेडिकल परेशानी ना हो, तो महिला को नार्मल डिलीवरी को ही अपनाना चाहिए। भले ही इसमें डिलीवरी के दौरान दर्द झेलना पड़ता है, लेकिन इस दर्द से महिला जल्दी उबर भी जाती है और उसके स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर रहता है।

    ऑपरेशन से डिलीवरी और नॉर्मल डिलीवरी में अंतर क्या है?


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    शिशु को दुनिया में लाने के लिए दो तरह की डिलीवरी अपनाई जाती हैं। सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean) और नार्मल डिलीवरी शिशु के जन्म के लिए कौन-सी डिलीवरी अपनाई जाएगी, यह ज्यादातर माँ और बच्चे के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

    एक ओर जहाँ सिज़ेरियन डिलीवरी में ऑपरेशन के ज़रिये इस दुनिया में लाया जाता है, तो वहीं दूसरी ओर नार्मल डिलीवरी में प्राकृर्तिक तरीके से महिला के योनि मार्ग से बच्चा जन्म लेता है।

    कई मामलों में डॉक्टर खुद महिला को सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean delivery) कराने की सलाह देते हैं, ऐसा तब होता है जब नार्मल डिलीवरी से माँ या शिशु को खतरा होता है। ऐसा अधिकतर माँ या शिशु को होने वाली स्वास्थ्य सम्बंधी दिक्कतों के चलते होता है। गर्भावस्था के 30वें सप्ताह से लेकर 34वें सप्ताह के बीच अगर बच्चे का सिर नीचे की पॉज़िशन में आ जाए, तो नॉर्मल डिलीवरी की संभावनाएँ काफी हद तक बढ़ जाती है।

    नार्मल डिलीवरी कितनी तरह की होती हैं?

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery ) दो तरह की होती हैं-

    प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म  -इसमें किसी सुन्न करने की प्रकिया या दवाओं के प्रयोग के बिना बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से डिलीवरी कराई जाती है।
    एपिड्यूरल का इस्तेमाल (epidural child birth) -इसमें एनीस्थिसिया देकर अंगों को सुन्न करके डिलीवरी कराई जाती है।

    प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म

    natural child birth delivery


    जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है कि इस डिलीवरी में बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म होता है और बिना किसी दर्द की दवा के इस्तेमाल से डिलीवरी कराई जाती है।

    इसमें आपको हर एक दर्द, हर एक दबाव का अहसास होगा। इस डिलीवरी के दौरान जब आप पुश करते हैं तो आपको दबाव से थोड़ी राहत मिलेगी। फिर जब शिशु नीचे की ओर आ जाता है तो संकुचन (contraction) के दौरान दबाव बढ़ता जाता है। इस दौरान आपको मल त्याग करने जैसा अनुभव होता है।

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    अगर आप नेचुरल चाइल्ड बर्थ डिलीवरी (natural child birth delivery) को अपनाना चाहती हैं तो आपको इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि इसमें आपको कोई भी दर्द दूर करने का इन्जेक्शन या दवा नहीं दी जाएगी।

    एपिड्यूरल से डिलीवरी कराना

    epidural birth


    एपिड्यूरल डिलीवरी में सुन्न करने की प्रक्रिया को अपनाया जाता है। इस प्रक्रिया में आप डिलीवरी के दौरान जो भी महसूस करेंगी, वह सब इस पर निर्भर करता है कि आपको सुन्न करने के लिए कितनी मात्रा में दवा दी गई है। अगर आपको सुन्न करने के लिए सही तरह से दवा दी गई है, तो आपको डिलीवरी के दौरान होने वाला दबाव कम ही महसूस होगा। इस तरह की डिलीवरी में आपको योनि में होने वाला खिंचाव और डिलीवरी के दौरान जनन मार्ग में चीरा लगाने (एपिसियोटॉमी) का अहसास कम ही होगा।

    नार्मल डिलीवरी कितने समय तक चलती है?


    normal delivery in hindi

    अगर आप पहली बार माँ बनने वाली हैं नार्मल डिलीवरी में तकरीबन सात से आठ घंटे का समय लगता है। वहीं अगर आपकी यह दूसरी डिलीवरी है तो डिलीवरी में कम समय लग सकता है। यह निर्भर करता है कि आपकी गर्भाशय ग्रीवा (cervix) कितनी फैली हुई है।

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    बच्चे का जन्म कैसे होता है (baby kaise hota hai) यह सवाल हर महिला के मन में आता है। खासतौर पर उन महिला के मन में जो पहली बार माँ बनने वाली होती हैं। इसके अलावा नार्मल डिलीवरी कैसे होती है (normal delivery kaise hoti hai) इस बारे में हर महिला को जानना ज़रूरी है, ताकि आप इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझ सकें। अब हम आपको बताएंगे कि नार्मल डिलीवरी किस तरह होती है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) को तीन चरणों में बांटा जाता है

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    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का पहला चरण

    सबसे पहले गर्भाशय ग्रीवा (cervix) पतला होना और खुलना शुरू होता है। यह तकरीबन तीन सेंटीमीटर तक खुलती है। यह प्रक्रिया करीब एक से दो घंटे तक चलती है।

    इस चरण को भी तीन भागों में बांटा जाता है


    शुरुआती चरण - इसमें हर तीन से पांच मिनट में आपको प्रसव संकुचन (contraction) महसूस होता है। आपको बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होती है।

    क्रियात्मक - इसमें आपका सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) तीन से सात सेंटीमीटर तक खुल जाता है और लगातार दबाव बढ़ता है। यह दबाव ठीक वैसा होगा जैसे पीरियड्स के दौरान पीठ के निचले हिस्से में होने वाला दर्द होता है। ऐसा होने पर आपको अस्पताल जाने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    परिवर्तनकाल– इस दौरान आपका सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) दस सेंटीमीटर तक खुल जाता है। इसमें आपको श्रोणी (pelvic area) के निचले हिस्से में दर्द होगा और गर्भाशय के द्रव की थैली फटने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। इस चरण का दर्द लंबे समय तक लगातार चलता है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का दूसरा चरण

    शिशु का बाहर निकलना
    दूसरे चरण में शिशु गर्भाशय से बाहर निकलने लगता है। इसमें गर्भाशय ग्रीवा (cervix) फैलने लगती है और संकुचन बहुत तेज़ होता है और लंबे समय तक चलता है। हर तीन से चार मिनट में होने वाला ये संकुचन 45 से 60 सेकेंड तक हो सकता है। लेकिन कभी-कभी यह समय बढ़कर डेढ़ मिनट या उससे ज़्यादा भी हो सकता है। यह दर्द का तेज़ होता है। ऐसे में आप ज़ोर लगाना बंद ना करें और सांस नियमित रूप लेती रहें। शिशु के बाहर निकलने की प्रक्रिया तीन से पांच घंटे तक चलती है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का तीसरा चरण

    गर्भनाल बाहर आना
    यह नार्मल डिलीवरी (normal delivery) का अंतिम चरण है, जिसमें गर्भनाल पूरी तरह से योनि से बाहर आ जाती है। इसमें तकरीबन आधे घंटे का समय लगता है। इसके अलावा इसमें महिला के पेट के निचले हिस्से की मालिश की जाती है जिससे गर्भनाल भी पूरी तरह से बाहर आ जाती है। इस दौरान आपको ऐसा लगेगा कि यह गर्भनाल फिसलकर खुद-ब-खुद बाहर आ गई है।

    नार्मल डिलीवरी कराने के लिए टिप्स (Normal Delivery Tips in Hindi)

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    नॉर्मल डिलीवरी के लिए संतुलित खानपान खाएं

    एक संतुलित खानपान का भी नार्मल डिलीवरी में खास योगदान होता है। गर्भावस्था के दौरान पोषक तत्वों से भरपूर खाना खाएँ। विटामिन-सी (vitamin C) (संतरा, मौसमी, नींबू पानी) को अपनी डायट में शामिल करें। प्रोटीन (protein) (दूध, दही, पनीर, दालें) का सेवन ज़रूर करें। अगर नॉनवेज खाती हैं तो मछली, अंडा आदि अपने खानपान में शामिल करें। इसके अलावा कैल्शियम (calcium) युक्त भोजन (दूध, दही) ज़रूर खाएँ। डॉक्टर की निगरानी में रहकर आप कैल्शियम की गोलियाँ भी ले सकती हैं।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए शरीर में खून की कमी ना होने दें


    इसके अलावा अपने डॉक्टर से यह सुनिश्चित कर लें कि आपके शरीर में खून की कमी तो नहीं है। आपको बता दें कि खून की कमी हिमोग्लोबिन (hemoglobin) के कम होने से होती है और इसे एनीमिया (anemia) भी कहा जाता है। शरीर में खून की कमी ना हो इसके लिए आप अपने खानपान का विशेष ख्याल रखें। आप आयरन (iron) युक्त चीज़ें खाएँ। इसके अलावा आप डॉक्टर के कहने पर खून बढ़ाने की दवा भी ले सकती हैं।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए खूब पानी पिएँ


    इसके अलावा गर्भवती महिला को भरपूर मात्रा में पानी पीना काफी ज़रूरी है। उन्हें दिन में कम से कम आठ से दस ग्लास पानी पीना चाहिए।

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    नार्मल डिलीवरी के लिए पैदल चलें


    दिन में कुछ देर पैदल चलना, सैर पर जाना, टहलना आदि गर्भवती महिला के लिए काफी फायदेमंद रहता है। इससे नार्मल डिलीवरी की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।

    नार्मल डिलीवरी के लिए एक सही डॉक्टर का चुनाव


    गर्भवती के लिए एक सही और अनुभवी डॉक्टर का चुनाव करना काफी मायने रखता है। प्रेगनेंसी में आपको आपका डॉक्टर ही होता है जो आपके शरीर और शिशु के विकास पर पूरी नज़र बनाए रखता है और सही जानकारी देता है। इसलिए अपनी प्रेगनेंसी के लिए सही डॉक्टर का चुनाव करें और डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें और समय-समय पर डॉक्टर द्वारा बताई गई ज़रूरी जांच करवाती रहें।

    नार्मल डिलीवरी के लिए अच्छी नींद


    अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक अच्छी नींद लेना ज़रूरी है। इसलिए तनाव से दूर रहें और पर्याप्त नींद लें। अच्छा संगीत सुनें जिससे आपके मन को शांति पहुंचती हो। खुद को जितना शांत और तनाव से दूर रखेंगी नार्मल डिलीवरी की संभावना उतनी ही बढ़ेगी। इसके अलावा आप शरीर की मालिश करवाएँ जिससे आपकी थकान दूर हो और आपको अच्छा महसूस हो।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए वज़न नियंत्रित रखें


    वज़न का आपकी गर्भावस्था पर और डिलीवरी पर काफी असर पड़ता है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान वज़न बढ़ना सामान्य है लेकिन कोशिश करें कि आप ओवरवेट ना हों और ना ही ज़रूरत से ज़्यादा वज़न कम हो। गर्भावस्था में आपका कितना वज़न है यह प्रेगनेंसी के पहले के वज़न पर भी निर्भर करता है। इसलिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें और अपने वज़न पर ध्यान दें।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए एक्सरसाइज़ 

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    एक स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम ना सिर्फ़ प्रेगनेंसी में बल्कि सामान्य दिनों में भी ज़रूरी है। इससे ना सिर्फ़ आपका शरीर तंदरुस्त रहता है बल्कि व्यायाम मानसिक रूप से भी आपको चुस्त रखता है। कुछ व्यायाम ऐसे हैं जिनके करने से आपकी नार्मल डिलीवरी होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। इनमें से क्लेम शेल एक्सरसाइज़, हिप रेज़/ब्रिज एक्सरसाइज़, लाइंग कॉब्लर पोज़, स्क्वॉट (उठक-बैठक) , अपर बैक स्ट्रैचिंग आदि के साथ और भी कुछ ऐसी एक्सरसाइज़ हैं जो नार्मल डिलीवरी में आपको काफी फायदा पहुंचाती है।

    नार्मल डिलीवरी के बाद होने वाली परेशानियां

    हर महिला का स्वास्थ्य अलग होता है, हर महिला के शरीर की स्थिति भी अलग होती है। इसलिए नार्मल डिलीवरी के बाद कुछ महिलाएँ जल्दी तंदरुस्त हो जाती हैं, तो वहीं कुछ महिलाओं को ठीक होने में समय लग जाता है। ज्यादातर महिलाओं को नार्मल डिलीवरी के बाद कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता ही है, जैसे डिलीवरी के बाद तनाव (postpartum depression) , योनि का छिलना, संक्रमण, ब्लीडिंग, पेशाब करने में दिक्कत, स्ट्रेच मार्क्स आदि।

    एक स्त्री के शरीर को समझना काफी मुश्किल होता है। महिला को हर दर्द, हर तकलीफ सहन करने का वाकई में वरदान होता है। यही कारण है कि महिला खुशी-खुशी नार्मल डिलीवरी के दर्द को सहन कर जाती है। नार्मल डिलीवरी का दर्द बस वही महिला समझ सकती है, जो इस पड़ाव से गुज़री हो। चूंकि बिना किसी शिकायत के महिला इस दर्द को झेल लेती है, इसलिए हमारा भी फर्ज़ बनता है कि अगर एक स्त्री एक जीवन को इस दुनिया में लाने का जज़्बा रखती है, तो उसका ख्याल, उसकी देखभाल हम सब मिलकर करें।

    Mar 8, 2019

    March 08, 2019

    Sex in Pregnancy

    गर्भावस्था में सेक्स

    गर्भावस्था में सेक्स (Sex in pregnancy) एक बहुत ही संवेदनशील और ज़रूरी विषय है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से कभी उनमें सेक्स करने की (रिलेशन बनाने की) इच्छा होती है, तो कभी नहीं। गर्भावस्था में सेक्स करना सही है या नहीं, या फिर इससे शिशु को नुकसान होता है, ये सारे सवाल हर गर्भवती महिला के मन में होते हैं।

    गर्भवती महिलाओं के इन्ही तमाम सवालों का समाधान हम इस ब्लॉग के जरिये बताने जा रहे हैं, ताकि गर्भावस्था में सेक्स को लेकर महिलाएं तनाव मुक्त रहें।






      Sex in pregnancy in hindi

      क्या गर्भावस्था में सेक्स करना सुरक्षित है?


      Sex in pregnancy in hindi

      गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) करने को लेकर गर्भवती महिलाओं के मन में कई तरह के सवाल होते हैं, जिनमें पहला सवाल तो यही होता है कि क्या गर्भावस्था में सेक्स करना सुरक्षित है?

      विशेषज्ञों के अनुसार, अगर गर्भवती को गर्भावस्था से संबंधित कोई जटिलता या स्वास्थ्य संबंधी कोई अन्य समस्या नहीं है, तो इस दौरान सेक्स करना बिल्कुल सुरक्षित है। कई लोग गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में चिंतित रहते हैं कि कहीं सेक्स से उसे कोई नुकसान ना हो जाए। मगर, शिशु गर्भाशय के अंदर सुरक्षित होता है, इसलिए थोड़ी सावधानियों के साथ आप आराम से सेक्स कर सकते हैं।

      प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem

      यूँ तो गर्भावस्था में रिलेशन बनाना (pregnancy me sambhog) सुरक्षित होता है, और आप जितना चाहें उतना सेक्स कर सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में सावधानी बरतने में ही आपकी भलाई होती है।

      किन स्थितियों में गर्भावस्था में सेक्स नहीं करना चाहिए?


      विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ विशेष स्थितियों में आपको प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) करने से बचना चाहिए। इनमें से कुछ प्रमुख स्थितियों के बारे में नीचे बताया गया है -

      • अगर आपका पहले कभी गर्भपात हुआ हो, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) नहीं चाहिए। इसके साथ ही अगर वर्तमान गर्भावस्था में आपको गर्भपात होने का ख़तरा है, तो आपको इस दौरान सावधानी के तौर पर सेक्स से दूरी बना कर रखनी चाहिए।
      • अगर आपकी पिछली गर्भावस्था में आपका समयपूर्व प्रसव (premature delivery) हो गया था, तो आपको डॉक्टर की सलाह से ही प्रेगनेंसी में सेक्स करना चाहिए।
      • अगर आपको प्लेसेंटा से जुड़ी कोई समस्या (जैसे प्लेसेंटा प्रिविआ) है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) नहीं करना चाहिए।
      • अगर आपकी गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स सामान्य नहीं है या समय से पहले खुलने लगी है, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sex) से बचना चाहिए।
      • अगर आपके गर्भाशय की झिल्ली में छेद है और आपका एमनियोटिक द्रव लीक होता है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं करना चाहिए।
      • अगर आपकी योनि से बिना किसी वजह से रक्तस्राव हो रहा है, तो आपको प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं (pregnancy me sex) करना चाहिए।
      • अगर आपके पति को यौन संक्रामक रोग जैसे जेनिटल हर्पीज (जननांग में दाद-खुजली), एच.आई.वी./एड्स, गोनोरिया आदि है, तो आपको हर हालत में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) से बचना चाहिए। अगर आपका सेक्स करने का बहुत ज्यादा मन है, तो आपको डॉक्टर की सलाह से, अच्छी गुणवत्ता का कंडोम लगाकर ही सेक्स करना चाहिए।
      • अगर आपको सेक्स के बाद गर्भाशय संकुचन महसूस होते हैं, तो आपको डॉक्टर की सलाह के बिना प्रेगनेंसी में सेक्स नहीं करना चाहिए।

      गर्भावस्था की पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में सेक्स कैसे करें?

      एक शोध के अनुसार, गर्भावस्था की तीनों तिमाहियों में सेक्स किया जा सकता है। हालांकि यह आपकी आम सेक्सुअल लाइफ से थोड़ा अलग होता है, लेकिन कुछ सावधानियों के साथ आप प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) का भरपूर मजा ले सकते हैं। आपको गर्भावस्था की विभिन्न तिमाहियों में निम्न तरह से सेक्स करना चाहिए -

      • पहली तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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      आमतौर पर गर्भावस्था की शुरूआत में संभोग करना सुरक्षित होता है, लेकिन सावधानी के तौर पर आपको शुरुआती दो - तीन हफ़्तों के लिए सेक्स नहीं करना चाहिए। पहली तिमाही में सेक्स करना दूसरी व तीसरी तिमाही की तुलना में आसान होता है, क्योंकि अभी आपका पेट ज्यादा बढ़ता नहीं है। प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के दौरान ऐसी अवस्था में रहें, जिससे आपके पेट पर दबाव ना पड़े और गर्भ सुरक्षित रहे।

      Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

      • दूसरी तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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      गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में आपके शरीर में कई बदलाव होते हैं। इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव की वजह से आपकी सेक्स करने की इच्छा कभी बहुत ज्यादा तो कभी बिल्कुल कम हो सकती है। इस दौरान आराम से सेक्स करें और अपने पेट पर बिल्कुल दबाव ना पड़ने दें। अगर आप शारीरिक रूप से फिट हैं और आपको डॉक्टर ने सेक्स करने के लिए मना नहीं किया है, तो आप प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) कर सकते हैं।

      • तीसरी तिमाही के दौरान प्रेगनेंसी में सेक्स

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      गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में सेक्स करने से पहले ज्यादातर लोगों के मन में एक चिंता रहती है, कि इससे समयपूर्व प्रसव तो नहीं हो जाएगा। विशेषज्ञ बताते हैं, कि कुछ दुर्लभ मामलों को छोड़कर प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) की वजह से समयपूर्व प्रसव नहीं होता है। इस दौरान कुछ सुरक्षित स्थितियों में ही सेक्स करना चाहिए (जैसे - करवट वाली स्थिति, महिला का ऊपर होना आदि) ताकि आपके पेट पर दबाव ना पड़े।

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      नोट -अगर आपके मन में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) को लेकर कोई सवाल या चिंता है, तो डॉक्टर से बेहिचक बात करें, क्योंकि वो आपको आपकी स्थिति के अनुसार सही सलाह दे पाएंगे।

      क्या प्रेगनेंसी में सेक्स करने से शिशु को नुकसान पहुंचता है?


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      नहीं, गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आपके शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। शिशु के चारों तरफ एमनियोटिक द्रव और गर्भाशय की मांसपेशियों का मजबूत कवच होता है। इस कवच की वजह से सेक्स के दौरान शरीर में होने वाली हलचल का शिशु पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

      इसके साथ ही आपके पति का लिंग आमतौर पर आपकी सर्विक्स तक नहीं पहुंच सकता है, इसलिए सेक्स के दौरान केवल योनि ही प्रभावित होती है।

      क्या प्रेगनेंसी में सेक्स करने से प्रसवपीड़ा शुरू हो सकती है?

      अगर आपकी गर्भावस्था सामान्य और जोखिम-रहित है, तो इस दौरान सेक्स करने या ऑर्गेजम यानी चरमोत्कर्ष पर पहुंचने से प्रसवपीड़ा शुरू होने का खतरा न के बराबर होता है। मगर, ऑर्गेजम के साथ ही पति के वीर्य में मौजूद प्रोस्टेगलैंडिन हॉर्मोन (prostaglandins) की वजह से आपको गर्भाशय में हल्के संकुचन महसूस हो सकते हैं।

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      गर्भावस्था में सेक्स करने की सही अवस्थाएं क्या हैं?

      Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स

      गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) करते समय आपको वही स्थिति अपनानी चाहिए, जिससे पेट के निचले हिस्से पर दबाव कम पड़े। तो चलिए जानते हैं कि आप गर्भावस्था के दौरान किन स्थितियों में सेक्स कर सकते हैं।

      • करवट वाली स्थिति - इस तरह की स्थिति में महिला के पेट के निचले हिस्से में कम दबाव पड़ता है। गर्भावस्था में सेक्स करवट वाली स्थिति में करना सुरक्षित माना जाता है।
      • महिला का ऊपर होना - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) के दौरान महिला को ऊपर होने वाली स्थिति अपनानी चाहिए। महिला जब ऊपर होती है, तो उसके पेट पर दबाव नहीं पड़ता है। साथ ही वो समय समय पर खुद को नियंत्रित करने में भी सक्षम रहती है।
      • लेटने वाली स्थिति - इस स्थिति में महिला पेट को ऊपर करके पीठ के बल लेटती है और उसके घुटने ऊपर की तरफ होते हैं, तो तलवे जमीन से जुड़े रहते हैं। गर्भावस्था में संभोग इस स्थिति में करने से महिला को कोई असुविधा नहीं होती।

      क्या गर्भावस्था में मौखिक सेक्स कर सकते हैं?

      Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स


      गर्भावस्था में योनि सेक्स से बेहतर मौखिक सेक्स होता है, लेकिन मौखिक सेक्स में कुछ चीजों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। दरअसल, मौखिक सेक्स (oral sex) करते समय आपको योनि में फूंक नहीं मारनी चाहिए, इससे वायु के बुलबुले रक्त वाहिका में रूकावट डालते हैं, जिसकी वजह से महिला या शिशु की मौत हो सकती है।

      अगर आपको या आपके पति को किसी भी तरह का संक्रमण हो तो मौखिक सेक्स नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण बढ़ता है। अगर आपको ओरल सेक्स (oral sex) करने में कोई भी दुविधा हो तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

      गर्भावस्था में सेक्स करने के क्या फायदे हैं?

      Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स

      गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करना मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी है। तो चलिए जानते हैं कि प्रेगनेंसी में सेक्स करने के क्या फायदे हो सकते हैं।

      • ब्लड प्रेशर कम करता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से ब्लड प्रेशर (bp) कम होता है। ज्यादा ब्लड प्रेशर मां और शिशु दोनों के लिए हानिकारक है।
      • वजन कम करने में सहायक होता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आप ज्यादा फिट रह सकती हैं। इस दौरान आप सिर्फ 30 मिनट में 50 कैलोरी से ज्यादा खो सकती हैं, जोकि हेल्थ के लिए अच्छा है।
      • दर्द सहने की क्षमता को बढ़ाता है - गर्भावस्था में सेक्स करने से आपकी सहनशक्ति 78 प्रतिशत बढ़ जाती है, जिससे प्रसव के समय आपको थोड़ा आराम महसूस हो सकता है।
      • प्रसव के बाद जल्दी ठीक होने में मददगार होता है - गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने से आप प्रसव के बाद जल्दी ठीक हो सकती हैं, क्योंकि प्रेगनेंसी में सेक्स आपकी योनि से शिशु के जन्म को सरल बना देती है। जब शिशु का जन्म थोड़ा सरल होता है, तब प्रसव के बाद जल्दी ठीक होने की संभावना होती हैं।

      प्रेगनेंसी में सेक्स के बाद किन स्थितियों में डॉक्टर से सम्पर्क करें?

      गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के बाद निम्न स्थितियों में डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए -

      • गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy) के दौरान व चरमोत्कर्ष पर पहुंचने पर आपको गर्भाशय में संकुचन महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर ये संकुचन दो से पांच मिनट बाद भी बंद नहीं हो रहे हैं।
      • अगर प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) के बाद आपको पेट में दर्द या ऐंठन महसूस हो रही है।
      • अगर गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy) के बाद आपको योनि से रक्तस्राव हो रहा है।

      क्या गर्भावस्था में सेक्स करने के बाद अलग महसूस होता है?

      Sex in pregnancy in hindi : गर्भावस्था में सेक्स


      गर्भावस्था में सेक्स करने से महिलाओं को कुछ अलग परिवर्तन महसूस होता है, जिसमें से कुछ परिवर्तन निम्नलिखित हैं।

      • गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) के बाद पेट में ऐंठन महसूस हो सकती है।
      • गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy) के बाद निपल्स में दर्द महसूस हो सकता है।
      • गर्भावस्था में संभोग (pregnancy me relation banana) के बाद योनि से रक्तस्त्राव हो सकता है।
      • गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me sambhog) से महिला ज्यादा सुख अनुभव कर सकती हैं।

      गर्भावस्था में सेक्स से जुड़े मिथक क्या है?

      Sex in pregnancy in hindi


      गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy) करने को लेकर कई सारे मिथक हैं। हम आपको कुछ चुनिंदा मिथक नीचे बता रहे हैं -

      • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : संभोग से गर्भपात हो सकता है - कई लोगों का मानना होता है कि गर्भावस्था में सेक्स करने से गर्भपात हो सकता है। गर्भावस्था में सेक्स गर्भपात का कारण नहीं बनता है, क्योंंकि सेक्स का संकुचन और प्रसव का संकुचन अलग होता है। गौरतलब है कि आपको डॉक्टर से संपर्क करके यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आप पूरी तरह से फिट हैं।
      • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : शिशु को पता चल जाता है - कुछ लोग यह मानते हैं कि गर्भावस्था में सेक्स (garbhavastha me sambhog) करने के दौरान शिशु को सब पता चल जाता है कि उसके माता पिता क्या कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चा गर्भ थैली और गर्भाशय की मांसपेशियों से पूरी तरह से ढका रहता है।
      • प्रेगनेंसी में सेक्स से जुड़े मिथक : शिशु को चोट लगती है - गर्भावस्था में सेक्स (pregnancy me relation banana) को लेकर एक मिथक यह है कि अगर इस दौरान सेक्स करते हैं, तो शिशु को चोट लग जाती है, जबकि सच्चाई यह है कि शिशु पूरी तरह से गर्भ की थैली में सुरक्षित होता है, ऐसे में उसे चोट नहीं लग सकती है।
      गर्भावस्था के दौरान आप अपने पति को पहले से भी ज्यादा आकर्षित लग सकती हैं। ऐसे में आपके पति आपको संबंध बनाने के लिए कहें, और आपका भी मन हो तो आपको बेहिचक प्रेगनेंसी में सेक्स (sex during pregnancy) करना चाहिए। इस दौरान पेट पर दबाव ना पड़ने दें, ताकि शिशु को किसी प्रकार की परेशानी ना हो।

      गर्भावस्था में सेक्स (sex during pregnancy) करना सुरक्षित है, लेकिन अगर आपको डॉक्टर ने सेक्स करने के लिए मना किया है, तो आप सेक्स ना करें। इसके साथ ही अगर आपके मन में प्रेगनेंसी में सेक्स (pregnancy me sex) को लेकर किसी प्रकार की कोई दुविधा या चिंता है, तो आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

      Mar 6, 2019

      March 06, 2019

      Thyroid Problem in Pregnancy

      गर्भावस्था में थायराइड की समस्या

      एक प्रकार की तितली के आकार की अंत स्रावी ग्रंथि (endocrine gland) है, जो गले में होती है। यह दो इंच तक लंबी होती है और इसका भार तकरीबन आधे किलो तक होता है। थायराइड में दो प्रकार के हार्मोन यानी T3 और T4 हार्मोन होते है, जो मानव शरीर में सांस संबंधी समस्या और पाचन क्रिया में सहायक होते है। थायराइड ग्रंथि (thyroid gland) हार्मोन बनाने, उन्हें सुरक्षित रखने और नसों में छोड़ने में अहम योगदान देती है। (Thyroid Problem in Pregnancy) इसके अलावा थायराइड हार्मोन शरीर के विभिन्न अंगों को सुचारू रूप से काम करने और शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करते है।





        Thyroid Problem in Pregnancy in Hindi

        डिलीवरी के बाद थायराइड की समस्या के क्या कारण होते है?

        • यूं तो डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने के सही कारण का पता अब तक नहीं चल पाया है, लेकिन जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान या उससे पहले थायराइड की समस्या होती है, अक्सर उनमें प्रसव के बाद थायराइड की समस्या बनी रहती है।
        • प्रेगनेंसी की शुरुआत में और डिलीवरी के समय कुछ महिलाओं के शरीर में एंटी थायराइड एंटीबॉडी (anti thyroid antibody) की मात्रा बढ़ने लगती है, जिसे प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने का एक कारण माना जाता है।
        • इसके अलावा जिन महिलाओं में प्रसव के बाद बीमारियों से लड़ने की क्षमता घटती-बढ़ती रहती है, उनमें पहले से स्व-प्रतिरक्षित (autoimmune) थायराइड की समस्या होती है। इस परिस्थिति को हाशीमोटो रोग के समान माना जाता है। Thyroid Problem in Pregnancy
        • कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसी वायरस या बैक्टीरिया की वजह से होता है, वहीं कुछ डॉक्टर्स इसकी वजह रोगी के जीन्स को मानते हैं।
        • इसके अलावा प्रसव के बाद थायराइड की समस्या आयोडीन की कमी, शुगर (टाइप 1 डायबिटीज) और अवसाद की वजह से भी हो सकती है।

        प्रसव के बाद थायरायड की समस्या कब होती है?

        आमतौर पर महिलाओं को प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या बच्चे के जन्म के करीब चार से 12 महीनों के बीच होती है। दरअसल प्रेगनेंसी के बाद लगभग चार महीनों तक महिलाओं के शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली उनके थायरइड ग्रंथि पर निरंतर हमला करती है, जिसकी वजह से थायराइड हार्मोन का रिसाव होता है और वह रक्त कणिकाओं में मिल जाता है। इसकी वजह से महिला के शरीर में थायराइड हार्मोन की मात्रा या तो बढ़ जाती है या फिर घट जाती है।

        Pregnancy me bleeding ke karan or upay

        प्रसव के बाद थायराइड की समस्या के लक्षण क्या है?

        आमतौर पर थायराइड दो प्रकार के होते हैं, हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड। शिशु के जन्म के बाद आपको इनमें से किसी भी एक थायराइड की समस्या हो सकती हैं। महिलाओं में डिलीवरी के बाद थायराइड होने के लक्षण दिखाई देने पर आपको अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। नीचे प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) के लक्षणों को हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड के अंतर्गत दो भागों में विभाजित किया गया है।

        डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड के लक्षण क्या है?

        • वजन घटना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism) होने का सबसे पहला लक्षण वज़न का घटना हो सकता है।
        • थकान होना : अक्सर आपको थकान हो तो यह प्रसव के बाद हाइपर थायराइड का लक्षण हो सकता है।
        • घबराहट होना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism) होने पर अचानक घबराहट हो सकती है।
        • तेज़ धूप बर्दाश्त न कर पाना : तेज़ धूप बर्दाश्त ना कर पाना भी प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism) का लक्षण हो सकता है।
        • ज्यादा पसीना आना : डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism) की समस्या होने पर ज्यादा पसीना आ सकता है।
        • दिल की धड़कन बढ़ना : दिन के किसी भी समय अगर अचानक आपकी दिल की धड़कनें बढ़ने लगती है और आपको यह समस्या लगातार होती है तो यह प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (hyperthyroidism) का लक्षण हो सकता है।

        डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड के लक्षण क्या है?

        • वजन बढ़ना : अगर शिशु के जन्म के बाद आपका वजन असामान्य रूप से बढ़ रहा है तो यह डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
        • ठंड बर्दाश्त न कर पाना : प्रेगनेंसी के बाद ठंड बर्दाश्त न कर पाने को डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड का लक्षण माना जा सकता है।
        • मिजाज़ बदलना : बच्चे के जन्म के बाद अगर बिना वजह आपका मिजाज़ बदल रहा है तो यह डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
        • कब्ज होना : गर्भावस्था के बाद अगर आपको कब्ज की समस्या है, तो यह प्रसव के बाद हाइपो थायराइड का लक्षण हो सकता है। Thyroid Problem in Pregnancy
        • शुष्क त्वचा होना : त्वचा का शुष्क होना भी डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का संकेत हो सकता है। हालांकि शरीर में पानी की कमी होने से भी एेसा हो सकता है।
        • ज्यादा थकान होना : ज्यादा थकान होना भी डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का संकेत हो सकता है।
        • बाल झड़ना : प्रेगनेंसी के बाद अचानक ज्यादा बाल झड़ना प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) का लक्षण हो सकता है।
        (नोट : ऊपर बताए गए सभी लक्षण कई अन्य समस्याओं के संकेत भी हो सकते हैं, इसीलिए इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर की सलाह लेना आपके लिए सबसे बेहतर होगा)।

        डिलीवरी के बाद थायराइड होने का पता कैसे लगाया जाता है?

        महिलाओं में डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या काफी असामान्य होती है, लेकिन अगर आपको थायराइड के किसी भी लक्षण का अनुभव होता है तो आप इसका पता लगाने के लिए अपने डॉक्टर की सलाह ले सकती हैं। ज्यादातर मामलों में डॉक्टर खून की जांच करने की सलाह देते हैं। इस जांच को थायराइड प्रोफाइल टेस्ट (thyroid profile test) कहा जाता है, और लगभग सभी जांच केंद्रों में उपलब्ध होती है। यह जांच विभिन्न प्रकार के थायराइड हार्मोन्स यानी T3 और T4 हार्मोन के स्तरों का पता लगाने के लिए की जाती है। आमतौर पर डॉक्टर यह जांच महिलाओं को प्रसव के तीन से छह महीने के बाद करवाने की सलाह देते हैं। इसके अलावा खून की जांच में थायराइड हार्मोन को असंतुलित पाए जाने पर डॉक्टर आपको अल्ट्रासाउंड (ultrasound) के माध्यम से थायराइड की जांच करने की सलाह दे सकते हैं।

        डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड की जांच :

        प्रसव के बाद थायरायड (delivery ke baad thyroid) की जांच अल्ट्रासेंसिटिव टीएसएच (TSH) के स्तर का पता लगाकर की जाती है। जांच में अगर थायरॉक्सिन यानी T4 हार्मोन के स्तर में बढ़ोत्तरी और थायराइड स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन (TSH / Thyroid Stimulating Hormone) का स्तर, न्यूनतम स्तर से नीचे पाया जाता है तो आपको डिलीवरी के बाद हाइपर थायरायड (delivery ke baad hyperthyroidism) हो सकता है। यदि आपको पहले ग्रेव्ज बीमारी की समस्या रही हो तो खून में थायराइड स्टिम्यूलेटिंग इम्यूनोग्लोबिन की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

        Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

        डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड की जांच :

        डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की जांच में यदि आपके थायरॉक्सिन यानी T4 हार्मोन्स स्तर न्यूनतम से कम और थायराइड स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन (TSH / Thyroid Stimulating Hormone) के स्तर में बढ़ोत्तरी पाई जाती है तो आपको डिलीवरी के बाद हाइपो थायरायड (delivery ke baad hypothyroidism) हो सकता है। इस स्थिति में आपकी पियुष ग्रंथि से अधिक टीएसएच का स्राव होता है।

        क्या प्रसव के बाद थायराइड का इलाज हो सकता है?

        हां, प्रसव के बाद थायराइड का इलाज संभव है। हालांकि डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) होने के करीब 12 से 18 महीनों के बाद प्रसवोत्तर हाइपर थायराइड और हाइपो थायराइड का स्तर सामान्य हो जाता है, लेकिन ऐसा न होने पर डॉक्टर थायराइड के स्तर की निगरानी करते हैं और रोग से पीड़ित महिलाओं को हर चार महीने में थायराइड प्रोफाइल टेस्ट (thyroid profile test) करने की सलाह देते हैं। डॉक्टर्स कहते हैं कि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) का इलाज दवाइयों से नहीं किया जाता और ज्यादातर मामलों में यह एक साल के अंदर अपने आप ठीक हो जाता है। वहीं अगर डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) की समस्या ज्यादा है तो डॉक्टर थायराइड की जांच के नतीजों के आधार पर उपचार करते हैं।

        क्या डिलीवरी के बाद थायराइड की समस्या से मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है?

        डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) होने की स्थिति में पीड़ित महिला के स्तनों में दूध बनना कम हो जाता है, क्योंकि मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया में थायराइड हार्मोनों का अहम योगदान होता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जब मां के खून में थायराइड हार्मोन की मात्रा कम होती है तो इससे दूध नहीं बन पाता है, इसीलिए डिलीवरी के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) होने की स्थिति में थायरॉक्सिन हार्मोन (thyroxine hormone) के स्तर को नियंत्रण में रखा जाता है। इसके साथ ही डॉक्टर बताते हैं कि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) होने की स्थिति में मां के स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है और स्तनों में ज्यादा दूध बनने लगता है। हालांकि प्रसव के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) का स्तर अनियंत्रित होने पर डॉक्टर ऑपरेशन या रेडियोएक्टिव थेरेपी की सलाह दे सकते हैं।

        प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem

        क्या प्रसव के बाद थायराइड की गोलियां लेना स्तनपान और शिशु के लिए सुरक्षित है?

        विशेषज्ञ कहते हैं कि आमतौर पर प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) के लिए दी जाने वाली गोलियों का असर स्तनपान पर नहीं होता है। मां के खून में भी दवा की कुछ ही मात्रा पहुंचती है, लेकिन इससे शिशु की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इसीलिए डॉक्टर स्तनपान के दौरान हाइपो थायराइड की गोलियां लेना सुरक्षित मानते हैं। वहीं डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) की समस्या के लिए मां को आमतौर पर कोई दवाई नहीं दी जाती, क्योंकि कई मामलों में प्रसवोत्तर हाइपर थायराइड की समस्या कुछ समय के बाद सामान्य हो जाती है। हालांकि अगर किसी महिला की शरीर में प्रसव के बाद हाइपर थायराइड का स्तर असामान्य है तो उन्हें अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। डॉक्टर थायराइड के स्तर पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ गोलियां दे सकते हैं। इन गोलियों को लेते समय शिशु को स्तनपान कराना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसके अलावा डिलीवरी के बाद हाइपर थायराइड (delivery ke baad hyperthyroidism) ज्यादा होने पर डॉक्टर आपको अॉपरेशन या रेडियोएक्टिव थेरेपी की सलाह दे सकते हैं। इनसे स्तनपान और शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

        डिलीवरी के बाद थायराइड होने पर क्या सावधानियां बरतें?

        • अगर डिलीवरी की बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) की समस्या है तो डॉक्टर की सलाह पर ही दवाइयां लें।
        • नियमित रूप से अपने थायराइड के स्तर की जांच कराएं।
        • प्रसव के बाद हाइपो थायराइड (delivery ke baad hypothyroidism) की दवाइयों से आपको एलर्जी हो सकती है, जिनमें त्वचा में खुजली, आंखों में जलन, बाल झड़ना आदि आम है। अगर दवाइयों से आपको इनमें से किसी प्रकार की एलर्जी हो रही है तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
        • डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) को नियंत्रण में रखने के लिए अपने दिनचर्या में सुधार करें।
        • प्रसवोत्तर थायराइड होने की स्थिति में डॉक्टर की सलाह से संतुलित भोजन लें।
        • प्रसव के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) है तो तनाव से दूर रहें।
        प्रसव के बाद महिलाओं में थायरायड हार्मोन का स्तर बढ़ने या घटने से उन्हें कई प्रकार की समस्याएं, जैसे तनाव, चिड़चिड़ापन, थकान आदि हो सकती हैं, इसीलिए अपनी थायराइड की समस्या की निगरानी बेहद जरूरी है। इस ब्लॉग में प्रसवोत्तर थायराइड की समस्या से जुड़ी सभी जानकारी दी गई है। डिलीवरी के बाद थायराइड (delivery ke baad thyroid) (Thyroid Problem in Pregnancy) की समस्या से जूझ रहीं महिलाओं को इससे जुड़ी किसी अन्य जानकारी के लिए अपने डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

        Mar 4, 2019

        March 04, 2019

        Pregnancy me Skin Problem

        गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याएं

        गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जिसमेंं त्वचा संबंधी समस्याएं भी शामिल हैं। यूं तो प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem (skin problems in pregnancy) सामान्य है, लेकिन महिलाओं के लिए यह समस्या शारीरिक परेशानी से ज्यादा मानसिक तनाव है।


          महिलाओं के इसी मानसिक तनाव को दूर करने के लिए हम कुछ महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहे हैं, जिनकी मदद से गर्भावस्था के दौरान महिलाएं त्वचा संबंधी समस्याओं से बच सकती हैं।

          गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याएं क्यों होती है?


          skin problem during pregnancy

          कुछ ही महिलाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याएं (skin problems in pregnancy) नहीं होती बल्कि उनकी त्वचा चमकती रहती है, वरना ज्यादातर महिलाओं को त्वचा संबंधी समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है।
          गर्भावस्था में त्वचा संबंधी समस्याएं (skin problems in pregnancy) सामान्य होती हैं, लेकिन किसी किसी के लिए यह समस्या गंभीर हो जाती है।

          दरअसल, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से महिलाओं को ढेर सारी त्वचा संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ता है। प्रेगनेंसी के समय पेट बाहर आने की वजह से भी त्वचा में कई तरह के बदलाव होते हैं, ऐसे में हम बता रहे हैं कि आखिर प्रेगेंसी के समय महिलाओं को किन किन त्वचा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
          • त्वचा पर मुंहासों का होना
          • पेट और जांघों पर स्ट्रेच मार्क्स की समस्या होना
          • त्वचा पर खुजली होना
          • त्वचा का रंग बदल जाना

          गर्भावस्था के दौरान मुंहासे क्यों होते हैं?

          acne during pregnancy

          गर्भावस्था में मुंहासे होना बेहद सामान्य है, जिससे ज्यादातर महिलाएं जूझती हैं। दरअसल, गर्भावस्था के समय तेल की ग्रथिंया बहुत ही ज्यादा तेल का स्त्राव करती हैं, ऐसे में मुंहासें होना स्वभाविक है। ज्यादातर मामलों मेंं यह ठोडी के आसपास होते हैं, लेकिन कुछ महिलाओं के पूरे चेहरे पर फैल जाते हैं। (Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

          अगर मुंहासों का सही तरह से उपचार नहीं किया जाए तो यह प्रसव के बाद भी बरकरार रहते हैं, इसलिए शुरूआत से ही इनकी रोकथाम करना जरूरी है। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के समय मुंहासों से बचने के लिए क्या करना चाहिए।

          गर्भावस्था में ब्लीडिंग क्यों होती है? (Pregnancy me bleeding kyun hoti hai)

          गर्भावस्था के दौरान मुंहासे निकलने से कैसे रोकें?

          मुंहासों से बचने के लिए दिन में तीन से चार बार चेहरे को धोना चाहिए। चेहरे को बार बार धोने से त्वचा से तेल कम होेने लगता है, जिससे मुंहासे कम हो जाते हैं। तो चलिए जानते हैं कि मुंहासों को रोकने के घरेलू उपाय क्या है।
          • तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल - मुंहासों को कम करने के लिए तुलसी के पत्ते को गुलाबजल में मिलाकर चेहरे पर लगाना चाहिए।
          • नींबू के रस का इस्तेमाल - नींबू के रस में गुलाब जल की कुछ बूंदे मिलाकर चेहरे पर लगाने से मुंहासे कम हो जाते हैं।
          • संतरे के रस का इस्तेमाल - एक चम्मच शहद में थोड़ा संतरे का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से मुंहासें धीरे धीरे कम होने लगते हैं।
          • हल्दी का इस्तेमाल - हल्दी का इस्तेमाल करने से मुंहासे कम होने लगते हैं, ऐसे में हल्दी में नीम के पत्तों को मिलाकर पीस लें, इसके बाद इसे चेहरे पर लगाएं, 15 मिनट के बाद इसे धो लें।

          गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स क्यों होते हैं?

          stretch marks during pregnancy

          गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स का होना बेहद सामान्य है, लेकिन ये उन्हीं महिलाओं को ज्यादा होते हैं, जिनका वजन सामान्य से अधिक बढ़ता है। दरअसल, वजन बढ़ने की वजह से पेट पर धीरे धीरे निशान बनने लगते हैं, जोकि प्रेगनेंसी के बाद गहरे हो जाते हैं। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स से बचने के लिए क्या कर सकते हैं।

          गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स होने से कैसे रोकें?

          गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स से बचाव के लिए विटामिन ई क्रीम या तेल से पेट पर हल्के से मसाज करनी चाहिए। इसके अलावा अंडे का सफेद हिस्सा प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से भी स्ट्रेच मार्क्स की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। स्ट्रेच मार्क्स तभी जाते हैं जब वो लाल रंग के हो, सफेद रंग के होने नहीं जाते हैं। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

          गर्भावस्था में स्किन काली क्यों हो जाती है?

          skin blackness during pregnancy

          गर्भवती होने का पहला लक्षण त्वचा का रंग बदलकर गहरा हो जाना हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के निप्पल के पास गहरा काला घेरा बनता है, जिसे हर तीन में से दो गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी की शुरूआत से ही महसूस करती हैं।
          दरअसल, निप्पल ही नहीं बल्कि जांघ, नाभी, गले आदि जगहों का रंग पहले से बदलकर गहरा हो जाता है, जिसे क्लोस्मा या मेलास्मा (closma or melasma) भी कहते हैं।

          गौरतलब है कि इस दौरान महिलाओं की त्वचा में लाल रंग के चकते भी पड़ते हैं, जिसकी वजह से महिला को टेंशन हो जाती है। हालांकि, स्किन का गहरा रंग प्रसव के बाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है, लेकिन फिर भी इसका रोकथाम करना जरूरी है।

          गर्भावस्था के दौरान स्किन काली होने से कैसे रोकें 

          सूर्य की तेज़ किरणों से त्वचा का रंग लाल, भूरा या काला हो जाता है, इसलिए गर्भावस्था के दौरान धूप से जितना हो सके उतना बचना चाहिए। जब भी बाहर जाना हो, तो सनस्क्रीन क्रीम लगाकर ही जाएं, इससे त्वचा सुरक्षित रहती है। त्वचा पर किसी भी तरह का लोशन या क्रीम का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

          गर्भावस्था में पेट का निचला हिस्सा रूखा क्योंं हो जाता है?

          roughness during pregnancy

          प्रेगनेंसी में शिशु के विकास से पेट का आकार बढ़ता है, जिससे पेट में खिंचाव होता है। खिंचाव होने की वजह से पेट के निचले हिस्से में रूखापन महसूस होता है, इसलिए खुजली भी होने लगती है। पेट के निचले हिस्से के रूखेपन के साथ अगर खुजली भी हो रही है, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं।

          गर्भावस्था के दौरान पेट का निचला हिस्सा रूखा होने से कैसे रोकें

          गर्भवती महिलाएं पेट के निचले हिस्से के रूखेपन को कम करने के लिए क्रीम का इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन ध्यान रहे कि क्रीम हल्के हाथों से ही लगाएं। इसके अलावा दिन मेंं 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए, इससे त्वचा मेंं नमी बरकरार रहती है।

          गर्भावस्था के दौरान झाइयां और मस्सों की समस्या 


          warts during pregnancy

          प्रेगनेंसी के समय झाइयां और मस्सों का होना सामान्य है। गर्भावस्था के दौरान 50 प्रतिशत महिलाएं झाइयां और मस्सों का सामना करती हैं। दरअसल, गर्भावस्था में हार्मोनल बदलाव की वजह से निप्पल, चेहरे, गले, जांघ आदि जगहों पर झाइयां और मस्सों की समस्या होती है, जोकि प्रेगनेंसी के बाद अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

          Pregnancy month by month गर्भ में बच्चे का विकास हिंदी में

          गर्भावस्था के दौरान झाइयां और मस्सें होने से कैसे रोकें 

          प्रेगनेंसी के समय झाइयों औऱ मस्सोंं से बचाव करना संभव नहीं है, लेकिन अगर आपको इस तरह की कोई परेशानी हो, तो डॉक्टर से एक बार जरूर संपर्क कर लें। इस समस्या से बचने के लिए गर्भावस्था में साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

          गर्भावस्था में वैरिकोज वेन्स की समस्या क्यों होती है?

          varicose in pregnancy

          गर्भावस्था के दौरान त्वचा संबंधी समस्याओं मेंं वैरिकोज वेन्स (varicose veins) भी शामिल है। वैरिकोज वेन्स (varicose veins) की वजह से गर्भवती महिलाओं के पैरो की नसें उभरने लगती हैं, जो त्वचा पर साफ साफ दिखाई देती हैं, जिसके कारण उनके पैरो में काफी दर्द होता है।

          दरअसल, प्रेगनेंसी के दौरान रक्त प्रवाह भारी मात्रा में होता है, जिसकी वजह से वैरिकोज वेन्स (varicose veins) की समस्या होती है। इसके अलावा अगर गर्भवती महिला के घर में कोई सदस्य पहले से ही वैरिकोज वेन्स (varicose veins) से पीड़ित है, तो इसकी संभावना ज्यादा हो जाती हैं।

          गर्भावस्था के दौरान वैरिकोज वेन्स होने से कैसे रोकें 

          वैरिकोज वेन्स (varicose veins) की समस्या से बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं को लगातार बैठे या खड़े नहीं रहना चाहिए, और थोड़ी थोड़ी देर बाद टहलते रहना चाहिए। कामकाजी महिलाएं ऑफिस में कुर्सी पर बैठते वक्त पैरों को किसी टेबल के सहारे रखें, ताकि दवाब ज्यादा न हो।

          गर्भावस्था में खुजली क्योंं होती है? 


          itching-during-pregnancy-hindi

          गर्भावस्था में पेट का आकार बढ़ने की वजह से खुजली की समस्या भी हो सकती है। खुजली की समस्या यूं तो बेहद आम होती है, लेकिन कुछ मामलों में लिवर खराब होने की वजह से भी खुजली होती है, इसलिए खुजली की ज्यादा समस्या होने पर डॉक्टर से जरूर संपर्क कर लेना चाहिए।

          गर्भावस्था के दौरान खुजली होने से कैसे रोकें

          खुजली को रोकने के लिए क्रीम का इस्तेमाल करें या फिर नारियल के तेल से हल्की मालिश करें। इसके अलावा रोज़ाना शरीर को अच्छे से साफ करना चाहिए, ताकि गंदगी की वजह से खुजली की समस्या न हो। Your topic प्रेगनेंसी में स्किन प्रॉब्लम | Pregnancy me skin problem)

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल कैसे करें?


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          कुछ महिलाएं तो यह मान लेती हैं कि गर्भावस्था के समय वह खूबसूरत नहीं दिख सकती हैं क्योंंकि उन्हें स्किन संबंधी समस्याएं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, गर्भावस्था के दौरान महिलाएं सामान्य दिनों से ज्यादा खूबसूरत दिख सकती हैं, जिसके लिए उन्हें त्वचा की देखभाल करने की जरूरत होती है। तो चलिए जानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान त्वचा की देखभाल कैसे कर सकते हैं।

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: त्वचा को साफ रखें 

          स्किन की समस्याओं से बचने के लिए त्वचा की साफ सफाई करनी जरूरी है। दिन में तीन से चार बार चेहरे को साफ करना चाहिए। त्वचा को साफ करने के लिए आप जो उत्पाद इस्तेमाल करती हैं, वहीं करें।

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: भरपूर नींद लें 

          गर्भवती महिलाएं सामान्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा थक जाती हैं, जिसकी वजह से उन्हें पर्याप्त मात्रा में नींद लेनी की जरूरत है।

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: खूब पानी पीयें 

          त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए गर्भवती महिलाओं को दिन मेंं 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए। पानी त्वचा को नम बनाये रखता है, जिससे त्वचा संबंधी तमाम समस्याएं दूर होती है।

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: तेज़ धूप में जाने से बचे

          गर्भवती महिलाओं को तेज़ धूप में जाने से बचना चाहिए, क्योंकि सूर्य की तेज किरणों से त्वचा का रंग परिवर्तन हो जाता है। जब भी धूप में निकलना हो, तो सनस्क्रीन क्रीम लगाना बिल्कुल न भूलें।

          गर्भावस्था मेंं त्वचा की देखभाल: खुश रहें !

          गर्भावस्था में चमकती त्वचा के लिए क्रीम लगाने के साथ साथ खुश भी रहना चाहिए, क्योंकि खुश रहने से त्वचा में चमक होने के साथ ही स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

          महिलाएं गर्भावस्था के समय ऊपर लिखे सुझावों से खुद को स्किन समस्याओं से बचा सकती हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान महिलाएं को स्किन के बारे में चिंता करना छोड़कर अपने आने वाले शिशु के बारे में अच्छे से सोचना चाहिए।

          Mar 2, 2019

          March 02, 2019

          Pregnancy Month by Month

          Pregnancy Month by Month in Hindi

          हर महिला के लिए मां बनने की खुशी सबसे अनमोल खुशी होती है। जैसे ही एक महिला गर्भधारण करती है तो उसे शिशु के इस दुनिया में आने की उत्सुकता काफी बढ़ जाती है। प्रेगनेंसी के इन नौ महीनों में महिला के शरीर में काफी बदलाव होते हैं। गर्भ में बच्चे का विकास जिस तरह होना शुरू होता है इसी के साथ-साथ तमाम तरह के शारीरिक बदलाव होते हैं। महीने दर महीने (pregnancy month by month baby growth in Hindi) होने वाले गर्भ में बच्चे के विकास (Fetal development in Hindi) को मां पूरी तरह अनुभव करती है और गर्भावस्था की सबसे सुखद यात्रा का सुखद अनुभव लेती है। भले ही इन नौ महीनों में महिला काफी सारी शारीरिक तकलीफों से भी गुज़रती है लेकिन शिशु का इस दुनिया में आना और उसका पहला स्पर्श पाना मां के लिए इन तमाम तकलीफों को कम कर देता है। लेकिन जब शिशु गर्भ में होता है तो हर मां को इस बात के जानने की काफी उत्सुकता रहती है कि अब मेरा शिशु कितना बड़ा हो गया होगा, अब उसके किस अंग का विकास हुआ होगा, अब शिशु क्या-क्या महसूस कर सकता है आदि। गर्भ में बच्चे के विकास को अंग्रेजी में फीटल डवलप्मेंट (Fetal development) कहा जाता है। शिशु के विकास की इस प्रक्रिया को महीने दर महीने के हिसाब से आप अच्छी तरह समझ सकती हैं। आज हम इस ब्लॉग में आपको हर महीने के हिसाब से गर्भ में बच्चे का विकास की प्रतिक्रिया बताएंगे !




            pregnancy month by month baby growth in Hindi


            पहले महीने के दौरान गर्भ में बच्चे का विकास कैसे होता है?


            गर्भावस्था का पहला महीना ऐसा होता है जिसमें खुद महिला को ही नहीं पता होता कि वो गर्भवती है। लेकिन बच्चे के इस विकास की प्रक्रिया आपके आखिरी मासिक धर्म (पीरियड्स) के खत्म होने के पहले दिन से ही शुरू हो जाती है। इस दौरान गर्भाशय में एम्नियोटिक थैली (Amniotic sac in Hindi) का निर्माण होता है जो गर्भधारण के समय बनती है। इसी में ही शिशु का विकास होता है और पहली तिमाही में यहीं पर ही प्लेसेंटा (placenta in Hindi) भी बनती है। आपको बता दें कि प्लेसेंटा गोल और चपटी नाल है जिसके ज़रिए मां के पोषक तत्व शिशु तक पहुंचते हैं और बच्चे का मल भी इसी के ज़रिये बाहर निकलता हैं।
            • पहले महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस दौरान बच्चे की आंख से शुरुआत होकर उसका मुंह, जबड़ा और गले का विकास होने लगता है।
              • पहले महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के पहले महीने में शिशु की रक्त कोशिकाएं (blood cells in Hindi) और रक्त संचार शुरू होने लगता है।
            • पहले महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के पहले महीने में आपका बच्चा बिल्कुल चावल के दाने के आकार का होता है।
              • गर्भावस्था के पहले महीने के अंत तक अब आपका शिशु 6 से 7 मिमी. (1/4 इंच) लंबा हो जाता है।

            गर्भावस्था के दूसरे महीने में बच्चे का विकास 

            • दूसरे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के दूसरे महीने में शिशु के चहरे के साथ-साथ उसके कान बनने शुरू होंगे।
              • हाथों के स्थान पर अब उभार आने शुरू हो जाते हैं।
              • पैर और पैरों की उंगलियां बनने की भी शुरुआत हो जाती है।
            • दूसरे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • शिशु का मस्तिष्क, नर्वस सिस्टम, पाचन तंत्र, रीढ़ की हड्डी आदि इस महीने में विकसित होते हैं।
              • जो हड्डियां नरम होती हैं, इस महीने में वो कड़ी होनी शुरू हो जाती हैं।
              • इसके अलावा आपको दूसरे महीने के आखिरी चरण तक अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) में फीटल पोल (fetal pole) भी नज़र आएगा।
            • दूसरे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • शिशु हलचल करना शुरू कर देता है लेकिन बच्चे के लात मारने की हलचल को मां महसूस नहीं कर पाती।
            • दूसरे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • दूसरे महीने के अंत तक आपका शिशु लगभग 2.54 सेमी (एक इंच) लंबा और गर्भ में बच्चे का वज़न लगभग 9.54 ग्राम हो जाता है।

            गर्भावस्था के तीसरे महीने में बच्चे का विकास 

            • तीसरे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के तीसरे महीने के खत्म होने तक आपके शिशु के अंग पूरी तरह विकसित हो चुके होते हैं।
              • तीसरे महीने तक शिशु के हाथ, पैर, पैरों की उंगलियां पूरी तरह बन चुकी होती हैं।
              • इस महीने उसके दांत बनने शुरू हो जाते हैं।
              • उसके बाहर के कान और नाखून भी बन चुके होते हैं।
              • इसके अलावा शिशु के गुप्त अंग भी विकसित होने शुरू हो जाते हैं लेकिन इस महीने में शिशु के लिंग का पता नहीं लगाया जा सकता।
            • तीसरे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • शिशु के शरीर में नसें बन चुकी हैं और पेशाब करने का रास्ता भी बन चुका है।
            • तीसरे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • शिशु अब अपनी मुट्ठी को खोल बंद कर सकता है।
            • तीसरे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • तीसरे महीने के अंत तक आपका शिशु 7.6 से 10 सेमी (करीब 4 इंच) तक लंबा होगा और गर्भ में बच्चे का वज़न करीब 28 ग्राम हो जाता है।

            गर्भावस्था के चौथे महीने में बच्चे का विकास 


            अब गर्भावस्था का चौथा महीना यानी दूसरी तिमाही की शुरुआत हो चुकी है। इस महीने तक आपके बच्चे का काफी विकास हो चुका होता है।
            • चौथे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस महीने में शिशु की पलकें, आइब्रो, नाखूनों का विकास होने लगता है।
              • वहीं शिशु के गुप्त अंग भी अच्छी तरह विकसित हो जाते हैं।
              • इस महीने में आप चाहें तो डॉप्लर की सहायता से शिशु की दिल धड़कनें भी सुन सकती हैं - डॉप्लर अल्ट्रासाउंड (Doppler scan) स्कैन का ही एक प्रकार है जिससे गर्भ में शिशु के स्वास्थ्य का पता लगाया जाता है, इसके ज़रिए आप शिशु के दिल की धड़कन (baby ki heartbeat) भी सुन सकती हैं।
            • चौथे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इसके अलावा अब बच्चा अंगूठा चूस सकता है, अंगड़ाई ले सकता है और उबासी भी ले सकता है
            • चौथे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • महीने के अंत तक शिशु छह इंच लंबा (15 सेमी.) और गर्भ में बच्चे का वज़न 112 ग्राम हो जाता है।

            गर्भावस्था के पांचवे महीने में बच्चे का विकास 

            • पांचवे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के पांचवे महीने में शिशु के सिर पर बाल और कंधे, पीठ और माथे पर पतले और मुलायम बाल आने लगते हैं जो बच्चे की रक्षा करते हैं। जन्म के एक सप्ताह बाद ही ये बाल झड़ना शुरू हो जाते हैं।
              • इसके अलावा शिशु की त्वचा पर एक सफेद परत आ जाती है जिसे वर्निक्स कैसेओस (vernix caseosa in Hindi) कहा जाता है। यह परत शिशु की रक्षा उस समय करती है जब जन्म से पहले एम्नियोटिक द्रव (amniotic fluid) धीरे-धीेर खत्म होने लगता है।
            • पांचवे महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस महीने में शिशु की मांसपेशियां विकसित हो चुकी होती हैं।
            • पांचवे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • यही वो महीना है जिसमें आप अपने शिशु की हलचल महसूस करना शुरू कर देती हैं। अब शिशु अंगड़ाइयां लेना शुरू कर देता है।
            • पांचवे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के पांचवे महीने के अंत तक शिशु 25 सेमी. (10 इंच) लंबा हो जाता है और गर्भ में बच्चे का वज़न लगभग 400 ग्राम हो जाता है।

            गर्भावस्था के छठे महीने में बच्चे का विकास 

            • छठे महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस महीने में शिशु की त्वचा लाल रंग की हो जाती है और वह झुर्रीदार हो जाती है।
              • पारदर्शी त्वचा पर नसें साफ नज़र आने लगती हैं।
              • अब शिशु के हाथों और पैरों की उंगलियों पर निशान (फिंगर प्रिंट्स - finger prints in Hindi) बनने लगते हैं।
            • छठे महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • अब उसकी आंखें खुलने लगती हैं।
              • इस महीने में शिशु की हलचल बढ़ जाती है और वो हिचकियां भी ले सकता हैं।
              • शिशु के हिचकियां लेने पर आपको पेट में झटके का अहसास हो सकता है।
              • सोनोग्राफी के ज़रिये आप बच्चे की हलचल देख पाएंगी।
            • छठे महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था का छठा महीना यानी दूसरी तिमाही का आखिरी महीना जिसमें आपका शिशु 30 सेमी. लंबा (12 इंच) और अब गर्भ में बच्चे का वज़न करीब एक किलो हो जाता है।

            गर्भावस्था के सातवें महीने में बच्चे का विकास 

            • सातवें महीने में शिशु का आंतरिक विकास
              • गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में शिशु के शरीर में वसा (फैट) बननी शुरू हो जाती है।
            • सातवें महीने में शिशु की हलचल
              • इस महीने में आपका शिशु करवट ले सकता है और अब उसके सुनने की क्षमता विकसित हो चुकी है। इस महीने में शिशु बाहर की आवाज़ों और रोशनी होने पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है
            • सातवें महीने में शिशु का आकार
              • इस दौरान बच्चा 36 सेमी. (14 इंच) लंबा और गर्भ में बच्चे का वज़न एक से दो किलो का हो सकता है।

            गर्भावस्था के आठवें महीने में बच्चे का विकास 

            • आठवें महीने में शिशु के अंगों का विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • उसके अंदर के अंगों का विकास हो चुका है लेकिन अभी भी फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं
            • आठवें महीने में शिशु का आंतरिक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस महीने में भी शिशु में वसा (फैट) बननी जारी रहती है।
              • इस महीने में शिशु के मस्तिष्क का लगातार विकास होता है और अब उसकी देखने और सुनने की क्षमता पूरी तरह विकसित हो चुकी है।
            • आठवें महीने में शिशु की हलचल (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इसके साथ ही इस माह में आपको शिशु का लात मारना (baby kick - baby movement in pregnancy in Hindi) भी महसूस होगी।
            इस महीने में शिशु की हलचल आपको साफ महसूस होने लगेगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस महीने तक शिशु का काफी हद तक विकास (गर्भ में बच्चे का विकास) हो चुका होता है और उसे गर्भ में जगह कम पड़ने लगती है। आप अल्ट्रासाउंड के ज़रिये शिशु की हरकत को देख भी सकती हैं। लेकिन आपको बता दें कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि शिशु हमेशा ही हलचल करता रहे। वो आराम भी करेगा। इसलिए अगर अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) में शिशु हरकत करता नज़र ना आए तो आप परेशान ना हों। हो सकता है शिशु सो रहा हो।
            • आठवें महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • आपका शिशु 46 सेमी. (18 इंच) का हो जाता है और गर्भ में बच्चे का वज़न 2.27 किलो हो जाता है।

            गर्भावस्था के नौवें महीने में बच्चे का विकास 


            गर्भावस्था का नौवा महीना शुरू हो गया है और पूरा बन चुका है, बस उसके फेफड़े विकसित होने बाकी हैं। अब ज्यादा समय नहीं है आपके शिशु के इस दुनिया में आने का।
            • नौवें महीने में शिशु की गतिविधि (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • इस महीने में शिशु अपनी पॉजिशन बदल लेता है और उसका सिर नीचे की ओर जन्म देने वाली नलिका में आ जाता है।
            • नौवें महीने में शिशु का आकार (गर्भ में बच्चे का विकास)
              • गर्भावस्था के आखिरी माह तक उसका वज़न 3.2 किलो और उसकी लंबाई 50 इंच (18 से 20 इंच) हो जाती है।

            गर्भ में शिशु का लिंग पता लगाना - लड़का है या लड़की - How to know boy or girl during pregnancy at home


            यूं तो आजकल के लोग लिंग भेद को लेकर काफी जागरुक हो गए हैं और अब लड़का और लड़की का भेद ना करके दोनों का खुले दिल से स्वागत करते हैं। लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि कुछ लोग वाकई में गर्भ में लड़का या लड़की के होने का पता लगाने के लिए टेस्ट करवाने की चाह रखते हैं। आपको बता दें कि गर्भ में शिशु का लिंग जानना एक कानूनी अपराध है और ऐसा करने पर आपको सज़ा भी हो सकती है। ज़रा सोचिए कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक संतान पाने के लिए न जाने कितनी दुआएं मांगते हैं लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें संतान सुख नहीं मिल पाता। ऐसे में वो बस चाहते हैं कि उन्हें किसी तरह से एक बार संतान सुख मिल जाए। ऐसे में लड़का और लड़की के बीच आज भी फर्क करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि ईश्वर ने उनको बहुत सौभाग्यशाली बनाया है जो उनको जल्द ही संतान सुख मिलने वाला है, और आज लड़का और लड़की दोनों बराबर हैं। इसलिए गर्भ में शिशु के लिंग जानने की, लड़का कैसे पैदा करें आदि बातों के बारे में सोचना छोड़ें और भगवान के दिए इस वरदान का दिल खोलकर स्वागत करें। चाहे लड़का हो या लड़की, आप दोनों के लिए खुद को तैयार करें और उसके अच्छे भविष्य की योजना बनाएं। चूंकि हर मां के लिए गर्भावस्था का समय काफी खुशनुमा होता है और बच्चे की हर गतिविधि, उसके विकास को जानने की इच्छा उनमें रहती ही है। आप डॉक्टर की मदद से और अपने खुद के अनुभव से गर्भ में बच्चे का विकास महसूस कर पाएंगी। आप खुश रहें, अच्छा खानपान खाएं और गर्भावस्था के हर पल का आनंद उठाएं।