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Apr 26, 2019

Normal Delivery Kaise Hoti Hai

नार्मल डिलीवरी कैसे होती है?


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एक महिला को जैसे ही पता चलता है कि वह गर्भवती (pregnant) है, तो बच्चे के आने का इंतज़ार पहले दिन से ही शुरू हो जाता है। इंतज़ार होता है, अपने नन्हीं-सी जान को अपने सीने से लगाने का, इंतज़ार होता है उसके पहले स्पर्श को महसूस करने का।

उसके पहले स्पर्श के अहसास करने का इंतज़ार नौ महीने की तकलीफों को काफी छोटा बना देता है। गर्भवती होने की खबर से ही महिला को बस डिलीवरी की तारीख का इंतज़ार रहता है। बच्चा कब इस दुनिया में आएगा इसके लिए हर माँ के मन में उत्सुकता बनी रहती है।

ऐसे में महिला को अपनी अनुमानित जन्मतिथि पर ध्यान देना चाहिए। इस तरह आप शिशु की जन्म तिथि का पता लगा सकती हैं।


    डिलीवरी की अनुमानित तिथि कैसे पता लगाएं?

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    ड्यू डेट कैलकुलेटर (due date calculator) से आप अपने शिशु की अनुमानित जन्म तिथि का पता लगा सकती हैं। इसके लिए आपको अपनी पिछली माहवारी को ध्यान में रखना होगा।

    अपनी पिछली महावारी (पीरियड्स) के पहले दिन से शिशु की संभावित जन्म तिथि की गणना कर सकते हैं।
    आपको बता दें कि गर्भावस्था नौ महीने सात दिन तक या 40 सप्ताह तक चलती है।

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    महिला की डिलीवरी की संभावित तिथि जानने के लिए प्रेगनेंसी की इस समय अवधि को अपने पिछले पीरियड की पहली तारीख से जोड़ दें।

    अगर आपको रेगुलर पीरियड होता है और 28 दिनों में होता है, तो यह केलकुलेशन ज़्यादा सटीक परिणाम देती है। डॉक्टर भी इसी आधार पर आपकी डिलीवरी डेट का अनुमान लगाते हैं।
    लेकिन जैसे-जैसे महिला की डिलीवरी की तारीख नज़दीक आती है, उसकी घबराहट काफी बढ़ जाती है। इसका सबसे पहला कारण होता है, डिलीवरी में होने वाला दर्द। इसके अलावा बहुत-सी महिलाओं के मन में इस बात को लेकर भी ख्याल आते हैं कि क्या उनकी नार्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean delivery) के ज़रिये वह शिशु को जन्म देंगी।

    बहुत-सी महिलाएँ नार्मल डिलीवरी के दर्द के डर से बचने के लिए खुद से सिज़ेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन डिलीवरी) कराने का फैसला लेती हैं। लेकिन कुछ महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बंधी दिक्कतों के चलते सिज़ेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन डिलीवरी) कराने के लिए डॉक्टर खुद ही सलाह देते हैं।

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    लेकिन सलाह यही दी जाती है कि अगर किसी तरह की मेडिकल परेशानी ना हो, तो महिला को नार्मल डिलीवरी को ही अपनाना चाहिए। भले ही इसमें डिलीवरी के दौरान दर्द झेलना पड़ता है, लेकिन इस दर्द से महिला जल्दी उबर भी जाती है और उसके स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर रहता है।

    ऑपरेशन से डिलीवरी और नॉर्मल डिलीवरी में अंतर क्या है?


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    शिशु को दुनिया में लाने के लिए दो तरह की डिलीवरी अपनाई जाती हैं। सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean) और नार्मल डिलीवरी शिशु के जन्म के लिए कौन-सी डिलीवरी अपनाई जाएगी, यह ज्यादातर माँ और बच्चे के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

    एक ओर जहाँ सिज़ेरियन डिलीवरी में ऑपरेशन के ज़रिये इस दुनिया में लाया जाता है, तो वहीं दूसरी ओर नार्मल डिलीवरी में प्राकृर्तिक तरीके से महिला के योनि मार्ग से बच्चा जन्म लेता है।

    कई मामलों में डॉक्टर खुद महिला को सिज़ेरियन डिलीवरी (cesarean delivery) कराने की सलाह देते हैं, ऐसा तब होता है जब नार्मल डिलीवरी से माँ या शिशु को खतरा होता है। ऐसा अधिकतर माँ या शिशु को होने वाली स्वास्थ्य सम्बंधी दिक्कतों के चलते होता है। गर्भावस्था के 30वें सप्ताह से लेकर 34वें सप्ताह के बीच अगर बच्चे का सिर नीचे की पॉज़िशन में आ जाए, तो नॉर्मल डिलीवरी की संभावनाएँ काफी हद तक बढ़ जाती है।

    नार्मल डिलीवरी कितनी तरह की होती हैं?

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery ) दो तरह की होती हैं-

    प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म  -इसमें किसी सुन्न करने की प्रकिया या दवाओं के प्रयोग के बिना बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से डिलीवरी कराई जाती है।
    एपिड्यूरल का इस्तेमाल (epidural child birth) -इसमें एनीस्थिसिया देकर अंगों को सुन्न करके डिलीवरी कराई जाती है।

    प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म

    natural child birth delivery


    जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है कि इस डिलीवरी में बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से बच्चे का जन्म होता है और बिना किसी दर्द की दवा के इस्तेमाल से डिलीवरी कराई जाती है।

    इसमें आपको हर एक दर्द, हर एक दबाव का अहसास होगा। इस डिलीवरी के दौरान जब आप पुश करते हैं तो आपको दबाव से थोड़ी राहत मिलेगी। फिर जब शिशु नीचे की ओर आ जाता है तो संकुचन (contraction) के दौरान दबाव बढ़ता जाता है। इस दौरान आपको मल त्याग करने जैसा अनुभव होता है।

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    अगर आप नेचुरल चाइल्ड बर्थ डिलीवरी (natural child birth delivery) को अपनाना चाहती हैं तो आपको इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि इसमें आपको कोई भी दर्द दूर करने का इन्जेक्शन या दवा नहीं दी जाएगी।

    एपिड्यूरल से डिलीवरी कराना

    epidural birth


    एपिड्यूरल डिलीवरी में सुन्न करने की प्रक्रिया को अपनाया जाता है। इस प्रक्रिया में आप डिलीवरी के दौरान जो भी महसूस करेंगी, वह सब इस पर निर्भर करता है कि आपको सुन्न करने के लिए कितनी मात्रा में दवा दी गई है। अगर आपको सुन्न करने के लिए सही तरह से दवा दी गई है, तो आपको डिलीवरी के दौरान होने वाला दबाव कम ही महसूस होगा। इस तरह की डिलीवरी में आपको योनि में होने वाला खिंचाव और डिलीवरी के दौरान जनन मार्ग में चीरा लगाने (एपिसियोटॉमी) का अहसास कम ही होगा।

    नार्मल डिलीवरी कितने समय तक चलती है?


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    अगर आप पहली बार माँ बनने वाली हैं नार्मल डिलीवरी में तकरीबन सात से आठ घंटे का समय लगता है। वहीं अगर आपकी यह दूसरी डिलीवरी है तो डिलीवरी में कम समय लग सकता है। यह निर्भर करता है कि आपकी गर्भाशय ग्रीवा (cervix) कितनी फैली हुई है।

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    बच्चे का जन्म कैसे होता है (baby kaise hota hai) यह सवाल हर महिला के मन में आता है। खासतौर पर उन महिला के मन में जो पहली बार माँ बनने वाली होती हैं। इसके अलावा नार्मल डिलीवरी कैसे होती है (normal delivery kaise hoti hai) इस बारे में हर महिला को जानना ज़रूरी है, ताकि आप इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझ सकें। अब हम आपको बताएंगे कि नार्मल डिलीवरी किस तरह होती है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) को तीन चरणों में बांटा जाता है

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    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का पहला चरण

    सबसे पहले गर्भाशय ग्रीवा (cervix) पतला होना और खुलना शुरू होता है। यह तकरीबन तीन सेंटीमीटर तक खुलती है। यह प्रक्रिया करीब एक से दो घंटे तक चलती है।

    इस चरण को भी तीन भागों में बांटा जाता है


    शुरुआती चरण - इसमें हर तीन से पांच मिनट में आपको प्रसव संकुचन (contraction) महसूस होता है। आपको बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होती है।

    क्रियात्मक - इसमें आपका सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) तीन से सात सेंटीमीटर तक खुल जाता है और लगातार दबाव बढ़ता है। यह दबाव ठीक वैसा होगा जैसे पीरियड्स के दौरान पीठ के निचले हिस्से में होने वाला दर्द होता है। ऐसा होने पर आपको अस्पताल जाने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    परिवर्तनकाल– इस दौरान आपका सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) दस सेंटीमीटर तक खुल जाता है। इसमें आपको श्रोणी (pelvic area) के निचले हिस्से में दर्द होगा और गर्भाशय के द्रव की थैली फटने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। इस चरण का दर्द लंबे समय तक लगातार चलता है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का दूसरा चरण

    शिशु का बाहर निकलना
    दूसरे चरण में शिशु गर्भाशय से बाहर निकलने लगता है। इसमें गर्भाशय ग्रीवा (cervix) फैलने लगती है और संकुचन बहुत तेज़ होता है और लंबे समय तक चलता है। हर तीन से चार मिनट में होने वाला ये संकुचन 45 से 60 सेकेंड तक हो सकता है। लेकिन कभी-कभी यह समय बढ़कर डेढ़ मिनट या उससे ज़्यादा भी हो सकता है। यह दर्द का तेज़ होता है। ऐसे में आप ज़ोर लगाना बंद ना करें और सांस नियमित रूप लेती रहें। शिशु के बाहर निकलने की प्रक्रिया तीन से पांच घंटे तक चलती है।

    नार्मल डिलीवरी (Normal Delivery) का तीसरा चरण

    गर्भनाल बाहर आना
    यह नार्मल डिलीवरी (normal delivery) का अंतिम चरण है, जिसमें गर्भनाल पूरी तरह से योनि से बाहर आ जाती है। इसमें तकरीबन आधे घंटे का समय लगता है। इसके अलावा इसमें महिला के पेट के निचले हिस्से की मालिश की जाती है जिससे गर्भनाल भी पूरी तरह से बाहर आ जाती है। इस दौरान आपको ऐसा लगेगा कि यह गर्भनाल फिसलकर खुद-ब-खुद बाहर आ गई है।

    नार्मल डिलीवरी कराने के लिए टिप्स (Normal Delivery Tips in Hindi)

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    नॉर्मल डिलीवरी के लिए संतुलित खानपान खाएं

    एक संतुलित खानपान का भी नार्मल डिलीवरी में खास योगदान होता है। गर्भावस्था के दौरान पोषक तत्वों से भरपूर खाना खाएँ। विटामिन-सी (vitamin C) (संतरा, मौसमी, नींबू पानी) को अपनी डायट में शामिल करें। प्रोटीन (protein) (दूध, दही, पनीर, दालें) का सेवन ज़रूर करें। अगर नॉनवेज खाती हैं तो मछली, अंडा आदि अपने खानपान में शामिल करें। इसके अलावा कैल्शियम (calcium) युक्त भोजन (दूध, दही) ज़रूर खाएँ। डॉक्टर की निगरानी में रहकर आप कैल्शियम की गोलियाँ भी ले सकती हैं।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए शरीर में खून की कमी ना होने दें


    इसके अलावा अपने डॉक्टर से यह सुनिश्चित कर लें कि आपके शरीर में खून की कमी तो नहीं है। आपको बता दें कि खून की कमी हिमोग्लोबिन (hemoglobin) के कम होने से होती है और इसे एनीमिया (anemia) भी कहा जाता है। शरीर में खून की कमी ना हो इसके लिए आप अपने खानपान का विशेष ख्याल रखें। आप आयरन (iron) युक्त चीज़ें खाएँ। इसके अलावा आप डॉक्टर के कहने पर खून बढ़ाने की दवा भी ले सकती हैं।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए खूब पानी पिएँ


    इसके अलावा गर्भवती महिला को भरपूर मात्रा में पानी पीना काफी ज़रूरी है। उन्हें दिन में कम से कम आठ से दस ग्लास पानी पीना चाहिए।

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    नार्मल डिलीवरी के लिए पैदल चलें


    दिन में कुछ देर पैदल चलना, सैर पर जाना, टहलना आदि गर्भवती महिला के लिए काफी फायदेमंद रहता है। इससे नार्मल डिलीवरी की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।

    नार्मल डिलीवरी के लिए एक सही डॉक्टर का चुनाव


    गर्भवती के लिए एक सही और अनुभवी डॉक्टर का चुनाव करना काफी मायने रखता है। प्रेगनेंसी में आपको आपका डॉक्टर ही होता है जो आपके शरीर और शिशु के विकास पर पूरी नज़र बनाए रखता है और सही जानकारी देता है। इसलिए अपनी प्रेगनेंसी के लिए सही डॉक्टर का चुनाव करें और डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें और समय-समय पर डॉक्टर द्वारा बताई गई ज़रूरी जांच करवाती रहें।

    नार्मल डिलीवरी के लिए अच्छी नींद


    अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक अच्छी नींद लेना ज़रूरी है। इसलिए तनाव से दूर रहें और पर्याप्त नींद लें। अच्छा संगीत सुनें जिससे आपके मन को शांति पहुंचती हो। खुद को जितना शांत और तनाव से दूर रखेंगी नार्मल डिलीवरी की संभावना उतनी ही बढ़ेगी। इसके अलावा आप शरीर की मालिश करवाएँ जिससे आपकी थकान दूर हो और आपको अच्छा महसूस हो।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए वज़न नियंत्रित रखें


    वज़न का आपकी गर्भावस्था पर और डिलीवरी पर काफी असर पड़ता है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान वज़न बढ़ना सामान्य है लेकिन कोशिश करें कि आप ओवरवेट ना हों और ना ही ज़रूरत से ज़्यादा वज़न कम हो। गर्भावस्था में आपका कितना वज़न है यह प्रेगनेंसी के पहले के वज़न पर भी निर्भर करता है। इसलिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें और अपने वज़न पर ध्यान दें।

    नॉर्मल डिलीवरी के लिए एक्सरसाइज़ 

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    एक स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम ना सिर्फ़ प्रेगनेंसी में बल्कि सामान्य दिनों में भी ज़रूरी है। इससे ना सिर्फ़ आपका शरीर तंदरुस्त रहता है बल्कि व्यायाम मानसिक रूप से भी आपको चुस्त रखता है। कुछ व्यायाम ऐसे हैं जिनके करने से आपकी नार्मल डिलीवरी होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। इनमें से क्लेम शेल एक्सरसाइज़, हिप रेज़/ब्रिज एक्सरसाइज़, लाइंग कॉब्लर पोज़, स्क्वॉट (उठक-बैठक) , अपर बैक स्ट्रैचिंग आदि के साथ और भी कुछ ऐसी एक्सरसाइज़ हैं जो नार्मल डिलीवरी में आपको काफी फायदा पहुंचाती है।

    नार्मल डिलीवरी के बाद होने वाली परेशानियां

    हर महिला का स्वास्थ्य अलग होता है, हर महिला के शरीर की स्थिति भी अलग होती है। इसलिए नार्मल डिलीवरी के बाद कुछ महिलाएँ जल्दी तंदरुस्त हो जाती हैं, तो वहीं कुछ महिलाओं को ठीक होने में समय लग जाता है। ज्यादातर महिलाओं को नार्मल डिलीवरी के बाद कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता ही है, जैसे डिलीवरी के बाद तनाव (postpartum depression) , योनि का छिलना, संक्रमण, ब्लीडिंग, पेशाब करने में दिक्कत, स्ट्रेच मार्क्स आदि।

    एक स्त्री के शरीर को समझना काफी मुश्किल होता है। महिला को हर दर्द, हर तकलीफ सहन करने का वाकई में वरदान होता है। यही कारण है कि महिला खुशी-खुशी नार्मल डिलीवरी के दर्द को सहन कर जाती है। नार्मल डिलीवरी का दर्द बस वही महिला समझ सकती है, जो इस पड़ाव से गुज़री हो। चूंकि बिना किसी शिकायत के महिला इस दर्द को झेल लेती है, इसलिए हमारा भी फर्ज़ बनता है कि अगर एक स्त्री एक जीवन को इस दुनिया में लाने का जज़्बा रखती है, तो उसका ख्याल, उसकी देखभाल हम सब मिलकर करें।

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